पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 595, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्वविवेक का संक्षेप ७ के कोटि पुण्यों का उदय होता है तब उसे संसार के गहन तत्व के पारखी गुरु के दर्शन मिल जाते हैं । संसार में जल के अथाह समुद्र भर पड़े हैं परन्तु मेघ के द्वारा आया हुआ जल ही पेय होता है । इसी प्रकार आत्मतत्व इस संसार में अनन्त रूप से परिपूर्ण हो ही रहा है, परन्तु वह हमारा उपयोगी तो गुरु के द्वारा हीं होता है । गाय के शरीर में जो घी रहता है वह उसके शरीर को पुष्ट नहीं करता । जब तो उसी को दुहकर बिलोकर फिर उस गाय को खिलाते हैं तब उसके शरीर की पुष्टि होती है । इसी प्रकार जो हमारा मथन करके आत्मसर्पि निकाल कर हमें ही खिला सके, वैसे गुरु की आव- श्यकता रहती ही है । गुरु की आवश्यकता पर कबीर के शब्द बड़े ही हृदयग्राही हैं:— वस्तु कहीं ढूँढे कहीं केह विध आवे हाथ । कहे कबीर तब पाइया जब भेदी लीना साथ ॥ भेदी लीना साथ कर दीना वस्तु लखाय । कोटि जनम का पन्थ था क्षण में पहुँचा जाय ॥ उस आचार्य के उपदेश से पांच कोशों में छिपे हुए आत्मा की सम्भावना मन में दृढतापूर्वक बैठ जाती है । जब यह आत्मा पांचों कोशों से छिप जाता है तब आत्मविस्मरण होकर इसे संसार में फंसना पड़ जाता है । मूँज में से जैसे तुली को निकाल लेते हैं इसी प्रकार आचार्यों की बताई युक्ति से जब धीर लोग इन तीनों शरीरों में रमे हुए आत्मतत्व का उद्धार कर चुकते हैं, तब उस उद्धृत आत्मा में वे ही लक्षण स्पष्ट दीखने लगते हैं जो कि ब्रह्म में बताये गये हैं । लक्षण की एकता को देख कर तब साधक को कहना पड़ जाता