पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 594, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें६ · पञ्चदशी कारण और सूक्ष्म शरीर तो सम्पूर्ण प्राणियों के एक समान ही होते हैं केवल स्थूल शरीरों में ही भिन्नता है । 'वैश्वानर' और 'विश्व' की कल्पना भी इन ही स्थूल शरीरों के आधार से की जाती है । विश्व कहाने वाले इन देवता पशु पक्षी और मनु- ष्यादियों को, अन्दर के गुप्त तत्व का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है । तमाशा देखने वाले बालक जैसे द्वारों पर खड़े रहते हैं, उसी तरह ये अपने अज्ञान के कारण सदा ज्ञानेन्द्रिय द्वार पर खड़े रहते हैं और कर्मेन्द्रिय रूपी मज़दूरों से कुछ उलट पुलट कराया करते हैं । इनकी बेसमझी को कहां तक कहा जाय, ये ऐसे चक्कर में फंसे हैं, ये ऐसे भंवर में पड़ गये हैं कि इनका निस्तार होना ही कठिन हो गया है । ये काम करते हैं इसलिये कि कुछ भोग [ मज़ा ] करेंगे । ये भोगते हैं इसलिये कि कुछ काम करेंगे । कर्म करने के कारण तो इनको उस कर्म का फल भोगना आवश्यक हो जाता है । भोग कर जब इन्हें कुछ क्षुद्र मज़ा हाथ आ जाता है तब ये दुगने उत्साह से फिर-फिर कर्मजाल में फँस जाते हैं। यों कर्म से भोग और भोग से कर्म की उत्पत्ति होती रहती है । इन कर्म और भोगों का पार ही इनके हाथ नहीं आता । इनके मन में कभी यह सवाल ही पैदा नहीं होता कि क्या हम सदा इस कर्म और भोग की श्रृंखला में ही जकड़े रहेंगे ? या कभी हमको इससे छुट्टी भी मिलेगी ? बेद्वार के दर्वाजे में बन्द किये अन्धों की तरह ये जन्मजन्मान्तरों में चक्कर लगाते रहते हैं। इन्हें कभी भी सुख के दर्शन नहीं होते । इनकी हालत नदी में बहते हुए उन कीड़ों की सी होती है जो एक भंवर से निकल कर दूसरे में फँस जाते हैं, उसमें से निकल कर तीसरे में जा गिरते हैं। जब कभी किसी