भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 593

तत्वविवेक का संक्षेप ५ परमानन्दरूपता का भी थोड़ा विचार करें। हरएक प्राणी अपने को ऐसा आशिष देता है कि मैं तो सदा ही बना रहूँ। जानते हो ऐसी आशंसा का गुप्त कारण क्या है ? इसका कारण आत्मा की सामान्य आनन्दरूपता नहीं है, किन्तु आत्मा की परमानन्द- रूपता ही ऐसी सर्वहृदयेश्वरी अभिलाषा का मुख्य कारण है। इस आत्मप्रेम को परमानन्दरूप कह देने का साहस हमने यों किया है कि यह प्रेम अपने स्वार्थ से तो दूसरों में भी हो जाता है, परन्तु दूसरों के स्वार्थ से अपने में प्रेम होने की बात कहीं देखी नहीं गई। यों जो (सत् चित् आनन्द) लक्षण ब्रह्म में बताये जाते हैं वे सभी इस आत्मा में भी पाये जाते हैं। अब जिसको अधिकारी देखते हैं, उससे वेदान्त और आचार्य यह महावार्ता कह देते हैं कि ओ दिङ्मूढ प्राणी! आत्मा और ब्रह्म ये दो पदार्थ नहीं हैं। ये तो एक ही वस्तु के दो नाम रख लिये गये हैं। आत्मा की जिस परमानन्दरूपता का वर्णन ऊपर किया है, वह ऐसी विचित्र परिस्थिति में फँस गई है कि वह ज्ञात भी रहती है और अज्ञात भी बनी रहती है। आत्मा की इस परमानन्द- रूपता को अंशतः छिपा लेने वाली अविद्या के ही 'माया' और 'अविद्या' नाम के दो बड़े भेद हैं। इन्हीं से ईश्वर, प्राज्ञ, आकाश आदि पांच भूत, पांच ज्ञानेन्द्रियें, मन, बुद्धि, पांच कर्मेन्द्रियें, पांच प्रकार के प्राण, ये सब कुछ उत्पन्न हो जाते हैं। इनसे फिर तैजस और हिरण्यगर्भ का जन्म होता है। फिर इन पांचों भूतों को स्थूल रूप में लाने के लिये इनका मिश्रण किया जाता है, जिसे 'पंचीकरण' कहते हैं। उन पंचीकृत भूतों से ब्रह्माण्ड भुवन तथा अनेक प्रकार के स्थूल शरीरों की उत्पत्ति होती है।