भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 592

४ पञ्चदशी


ब्रह्म का जो सच्चिदानन्द स्वरूप शास्त्र में बताया गया है ठीक वही लक्षण इस जीव में भी पाया जाता है। पहले 'सत्ता' को ही देख लें। सभी कहते हैं कि 'मैं हूँ' अर्थात् मेरी सत्ता है [मैं सत् हूँ] मैं एक त्रिकाल में रहने वाला पदार्थ हूँ। अब ज्ञान के विषय में भी विचार करें—जागरण काल में हमें शब्दस्पर्शादि के अन- गिनत ज्ञान होते हैं। उन ज्ञानों में, ज्ञान के विषय, शब्द या स्पर्श आदि, भले ही पृथक् पृथक् होते जायें, परन्तु उन सब विषयों को प्रकाशित करने वाला 'ज्ञान' तो सदा एकरूप ही रहता है। इस ज्ञान में जो कि भेद प्रतीत होने लगा है, वह शब्दस्पर्शादि उपाधियों के कारण ही है। जागरण और स्वप्न के ज्ञानों का विचार भी इसी प्रक्रिया से कर लेना चाहिये। जागरण और स्वप्न भले ही भिन्न भिन्न होते जायं, परन्तु उभयवर्ती सूत्र- रूप जो ज्ञान है, वह तो अखण्ड ही रहता है। सोते समय जो हमें अज्ञान का ज्ञान रहता है, वह ज्ञान भी एक अखण्ड तत्व ही है। कहने का तात्पर्य यही है कि दिन पर दिन, मास पर मास, वर्ष पर वर्ष, युग पर युग और कल्प पर कल्प बीत गये और बीतते चले जायेंगे; परन्तु यह ज्ञानदेव लुहार के ऐरन के समान, वैसे के वैसे ही स्वयंप्रकाश बन कर डट रहे हैं और डटें रहेंगे। इन ज्ञानदेव ने इस त्रिभुवन को व्याप्त कर रक्खा है। यदि अरबों कोस दूर अपने मन को भेजें या अनन्त कोटि सूर्यों का चक्कर लगाने का अपने मन को आदेश दे दें, तो भी यह ज्ञानदेव वहां पहले से ही बैठे पाये जाते हैं। सृष्टि बनने से पहले भी ये थे और नष्ट हो जाने के पश्चात् भी रहेंगे ही। ये न हों तो उन दोनों अवस्थाओं को कैसे जानें ? बस. ये व्यापक (देश और काल में व्यापक) ज्ञान ही आत्मा हैं। अब इनकी