पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 601, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचभूत का संक्षेप १३
चित्तों को अनन्त शान्तिदायक अखण्ड एकरस तत्व भी भयानक दीखता है। बालक जैसे जंगल में डरता है इसी तरह अखण्ड तत्व से भी कई लोगों को भय लगता है। परन्तु उनके डरने का कोई भी उचित कारण नहीं है। जब कोई समाधि करता है और जब निश्चित हो जाने की गम्भीर अवस्था आती है और तूष्णींभाव का उदय होता है, तब उस अखण्ड सद्वस्तु का अनुभव साधकों को स्पष्ट ही होता है। 'उस समय तो कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा विचार ठीक नहीं है, क्योंकि शून्य (कुछ नहीं) को जानने वाला जो कोई तत्त्व है उसको 'कुछ भी नहीं' कहना अनुचित है। शून्य को तो शून्य का ज्ञान होता ही नहीं है। जब हम निर्मनस्क होते हैं, उस निर्मनस्क अवस्था का जो साक्षी है, वही तत्त्व सत् पदार्थ है। इस सत् में इस पसारे को फैलाने की जो शक्ति रहती है, वह न तो असत् ही है, क्योंकि प्रतीत होती है और न सत् ही है, क्योंकि वह सदा नहीं रहती। उसकी बाधा हो जाती है। देवदत्त में देवदत्त की शक्ति भी रहती है, परन्तु शक्ति को और देवदत्त को दो नहीं गिना जाता। ये दोनों मिल कर एक ही गिने जाते हैं। इसी तरह ब्रह्म और उसकी शक्ति दो तत्व नहीं गिने जाते। कहने का तात्पर्य यह है शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता है। जैसे शक्ति के कारण द्वैत नहीं होता है, ठीक इसी तरह शक्ति के जो स्थूल कार्य (पृथिव्यादि) हैं उनसे भी द्वैत की शंका को अवकाश नहीं है। उस शक्ति से, सब से प्रथम आकाश उत्पन्न हुआ। उसमें जो सत्ता है वह इस सत् से ही आई है। सत् का ही आकाश बन गया है। 'आकाश की सत्ता' ऐसा कहना दार्शनिक भूल है। यह सत्ता वायु आदि अगले भूतों में भी गई है। आकाश उनमें नहीं गया, इसी कारण कहते हैं कि आकाश