भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 602

१४ पंचदशी और सत्ता भिन्न भिन्न तत्त्व है । आकाश में से सत्ता को पृथक् कर लो फिर बताओ आकाश का क्या रूप रह गया है ? सत् से भिन्न होने के कारण वह तो अब निश्चय ही असत् है। असत् होने पर भी प्रतीत हो रहा है, यही तो माया का चमत्कार है। आकाश तो कभी सत् हो ही नहीं सकता और सद्वस्तु में कहीं जरा सा भी स्थान नहीं है कि उसके अन्दर आकाशादि अन्य पदार्थ समा सकें। इसीलिये तत्त्वज्ञानी की दृष्टि जब आकाश पर पड़ेगी, तब वह उसे निस्तत्त्व समझेगा और जब सद्वस्तु पर उसका ध्यान जायगा तब वह उसे निश्छिद्र किंवा निरन्तर ही समझेगा। यों प्रत्येक भूत और प्रत्येक भौतिक पदार्थ की असत्ता पर जब बार बार विचार चलेगा, तब अद्वैत के सत्य होने की बात दृढ़तर होती जायगी। परन्तु ध्यान रहे कि इस असत्यवासना का प्रभाव व्यवहार पर कुछ भी नहीं पड़ेगा। वह तो पहले जैसा ही चलता जायगा। व्यवहार को बन्द कर देने का जो एक वृथा विचार नवीन साधकों को हो जाता है वह भूल होती है। होना यह चाहिये कि जो व्यवहार अब तक अपने संकीर्ण दृष्टिकोण से चल रहा था वही अब व्यापक जगदात्मा के दृष्टिकोण से चलना चाहिये । इस ज्ञान से पदार्थों का स्वरूप बदल नहीं जाता है। यह ज्ञान तो केवल हमारे दृष्टिकोण को बदलता है। ज्ञानी के व्यवहार में अवश्य ही कुछ ऐसा चमत्कार आ जाना चाहिये कि उसका व्यवहार आकर्षक हो, सदय हो, नमूने का हो, अनुकरणीय हो, लोकहित में बाधा न डालता हो। ऐसा जिसका व्यवहार हो वही ज्ञानी है। उस ज्ञानी की जिस परिमाण से द्वैत की अवज्ञा (अनादर) दृढ़ होगी उसी परिमाण से अद्वैत में बुद्धि ठहरेगी। यह बुद्धि जब ठहर चुकेगी और संसार समुद्र की