भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पंचभूतविवेक का संक्षेप १५

कूलंकष लहरें भी जब इस बुद्धि रूपी तट को तोड़ फोड़ नहीं सकेंगी तब यह पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहाने लगेगा। पाँचों भूत या पाँचों भूतों से बना हुआ कोई भी पदार्थ 'जब दीखे तभी उसके सत्य तत्त्व पर दृष्टि पड़ने लगे और उसमें ही जमने भी लगे तो यही 'द्वैतावज्ञा' कहाती है। यही 'अद्वैत बुद्धि' कही जाती है और उसे ही 'ब्राह्मी स्थिति' भी कह देते हैं। मरते समय भी एक क्षण भर के लिये भी यदि किसी को ऐसी उदार स्थिति हाथ लग जाय तो उसकी मुक्ति अवश्यंभाविनी है। फिर जो बड़भागी बचपन से ही इस शुभ स्थिति में जमने लगा हो, उसके विषय में तो पूछते ही क्या हो ? क्योंकि मरते समय जो भ्रान्ति नष्ट हुई है वह भ्रान्ति फिर कभी भी लौट कर नहीं आयेगी। मृत्यु को तो इस लोक और परलोक की मध्य सीमा मानते हैं। उस सीमा पर जिसकी भ्रान्ति नष्ट हो जायगी दूसरे शब्दों में उसकी परलोक यात्रा की पूँजी ही जल भुन कर राख हो जायगी। जिस पुरुष को उपर्युक्त प्रकार की द्वैतावज्ञा स्थित हो गई हो, जिसे ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो चुकी हो, वह महामना खाट पर सड़ कर, भूमि पर लोट कर, पूर्ण स्वस्थ रह कर या मूर्च्छावस्था में प्राणों का त्याग भले ही कर दे, उसे फिर भ्रान्ति कभी भी नहीं होगी। मूर्च्छा आदि के कारण तत्व का विचार न कर सकने पर भी ज्ञानी का ज्ञान नष्ट नहीं हो जाता है। क्या भला कहीं पढ़ा लिखा आदमी नींद आ जाने से कुपढ़ा हो जाता है ? जिस महाविद्या को प्रमाणों ने बड़े परिश्रम से जगाया है, वह विद्या अब कभी भी नष्ट होने वाली नहीं है। क्योंकि वेदान्तों से प्रवल तो कोई प्रमाण ही नहीं है। वेदान्तों के बताये जिस अद्वैत का पूर्ण अनुमोदन साधक के अनुभव ने कर दिया है उस अद्वैत की