पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 649, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थदीप का संक्षेप ६१ के स्वयं प्रकाश होने के कारण इनमें ज्ञान की व्याप्ति नहीं होती और उनमें ज्ञातता भी उत्पन्न नहीं होती। ये वृत्तियाँ जब उत्पन्न हो जाती हैं तब वे उत्पन्न होते ही स्वविषयक अज्ञान को भगा देती है। यों अज्ञान की व्याप्ति भी इन वृत्तियों में नहीं रहती और अज्ञातता भी नहीं होती । जिस दुगने चैतन्य का वर्णन ऊपर किया है, उसमें से जितने चेतन भाग के जन्म और नाश होते हुए प्रतीत होते हों, उसे तो अकूटस्थ मान लो तथा जो अविकारी भाग प्रतीत होता हो उसे 'कूटस्थ' जान लो । देह इन्द्रिय मन बुद्धि आदि से युक्त जो जीवाभास रूपी भ्रम हो गया है, इस भ्रम का अधिष्ठान जितना कुछ चेतन है, उसी चेतन को हम 'कूटस्थ' कह रहे हैं। तथा जिसको वेदान्तों ने सम्पूर्ण जगद्भ्रम का मूलाधिष्ठान बताया है उसे हम 'ब्रह्म' कहना चाहते हैं। जब एक ही चैतन्य में इस सम्पूर्ण जगत् का आरोप कर लिया गया है तब इस जीवाभास के विषय में जो कि उसी का एक भाग है शंका करनी व्यर्थ है। जगत् और जगत् का एकदेश यह चिदाभास ये दोनों आरोप- णीय पदार्थ हैं। यदि कोई किसी महायुक्ति से इन दोनों आरोप- णीय पदार्थों के भेद की विवक्षा करना छोड़ बैठे, तो फिर चिति एक की एक ही रह जाती है—फिर 'तत्' 'त्वं' पदार्थों में भेद नहीं रह जाता । अर्थात् चिति में जो भेद है वह तो औपाधिक किंवा भ्रान्तिजन्य है। सच्ची तो एकता ही है। भ्रम का कारण तो यह होता है कि—इस आभास ने बुद्धि के कर्तृत्व भोक्तृत्व आदि धर्मों को तथा आत्मा के स्फूर्ति नाम के धर्म को अपने में धारण कर लिया है। भ्रमस्थल की चांदी में जैसे अधिष्ठान और आरोप्य दोनों के ही धर्म दीखते हैं और वह कल्पित मानी जाती