भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 650, कुल 726 में से

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६२ पंचदशी है, इसी प्रकार दोनों के धर्म दीखने से यह आभास भी कल्पित वस्तु ही है । बुद्धि क्या है ? आभास कौन है ? इन सब में आत्मा नाम का पदार्थ कहाँ छिपा बैठा है ? यह जगत् का बवण्डर कैसे बन कर खड़ा हो गया है ? इन प्रश्नों को जब कोई सन्तोषजनक रीति से नहीं सुलझा लेता तब उसे मोह में फँसना पड़ जाता है । इन प्रश्नों का हल न करना ही 'संसार' कहाता है । यही मोह मुमुक्षु लोगों को हटाना है । यही सब अनर्थों का मूल निकास है । जिसने तो बुद्धि आदि के स्वरूप का विवेक कर लिया हो, वही ज्ञानी है, वही सब अनर्थों से मुक्त हो गया है । यह बात वेदान्तों ने डंके की चोट कही है । जिस संसार और जिस मोक्ष का वर्णन ऊपर किया है, उनको यदि कोई सच्चे मानों में समझ जाय, यदि किसी को यह मालूम हो जाय कि ये बन्ध और मोक्ष तो केवल अविवेक की खसकीली बुनियाद पर चिन कर खड़े कर दिए गये हैं तब फिर बन्ध किस का ? और मोक्ष किस का ? इत्यादि कुशंकाओं का समाधान साधक के हृदय में स्वयमेव हो जाता है—वह जान जाता है इन प्रश्नों को जिसने हल नहीं किया वह बद्ध है । जिसने इन प्रश्नों का हल कर दिया वह मुक्त ही है । इस कूटस्थ तत्व को संक्षेप में यों समझना चाहिए कि जब वृत्तियाँ उदय हो जाती हैं, तब यह तत्व वृत्तियों का साक्षी होकर, जब तक वृत्तियाँ उत्पन्न नहीं होतीं तब तक यह तत्व वृत्ति के प्रागभाव का साक्षी बन कर, आत्मजिज्ञासा जब किसी को हो जाय तब यह तत्व उसी का साक्षी रह कर, उससे पहले 'मैं अज्ञानी हूँ' ऐसे अज्ञान के साक्षी के रूप में, यह तत्व रहा