भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 726 में से

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६४ पंचदशी बजा रहे हैं। वे इस कूटस्थ के विरोधी किसी भी वस्तु को सहन नहीं करते हैं। हम औपनिषद लोग तो वेदान्तों के रहस्य को खोलने का उद्योग भर करते हैं। तर्क के आधार से कुछ कहने का तो हमारा संकल्प ही नहीं है। यदि हम तर्क के सहारे से कुछ कहते तो तार्किक लोगों को हम पर आक्षेप करने का अव- काश भी मिल जाता। मुमुक्षु को चाहिए कि इस दुरवगाह आत्म- तत्व को जानने के लिए केवल श्रुति का ही सहारा पकड़ लें। श्रुति का अभिप्राय तो स्पष्ट ही यह है कि—इन जीव और ईश्वर को माया ही उत्पन्न कर देती है। ईक्षण से लेकर प्रवेश पर्यन्त जितनी भी सृष्टि है, सो सभी ईश्वर की बनाई हुई है तथा जाग्रत् से लेकर मोक्ष पर्यन्त का सभी जगत्, जीव का बनाया हुआ है। अब कूटस्थ के विषय में भी सुन लीजिये—वह तो सदा ही कूटस्थ रहता है। जन्म, जरा, रोग, अनेक प्रकार की मानसी व्यथायें और मृत्यु अनादि काल से क्रमानुसार बराबर होते चले आ रहे हैं। इन सब के होने पर भी इस तत्व में आज तक कुछ भी अतिशय नहीं हो पाया है। इसीलिए मन में यह निश्चय कर लीजिए कि—मरण और जन्म कुछ भी नहीं है। बद्ध और साधक कोई भी नहीं है। मुमुक्षु और मुक्त किसी को भी नहीं कहना चाहिए। वह कूटस्थ तत्त्व मट्टी के पुतलों में वृथा ही लुक छिप कर जन्म-मरण का भ्रमपूर्ण अभिनय कर रहा है। मन और वाणी के अगम्य इस तत्व को, जब वह श्रुति किसी साधक को बता देना चाहती है, तब साधक की योग्यता के अनुसार या तो 'जीव' या 'ईश्वर' या फिर 'जगत्' का सहारा लेकर इस अवाङ्मनोगोचर तत्व का बोध ज्यों त्यों करके उसे करा देती है। इसी उद्देश्य को लेकर 'जीव' 'ईश्वर' और 'जगत्' के स्वरूप