पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 653, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थदीप का संक्षेप ६५ का प्रतिपादन जहाँ तहाँ किया गया है। उसका परम तात्पर्य तो जिस किसी भी प्रकार उस अगम्य तत्व का बोध करा देना ही है। बोध कराने की प्रक्रियायें भले ही अलग अलग हों परन्तु तत्व तो एक ही होता है। क्योंकि जिन पुरुषों को बोध कराना है उन सब के चित्त एक समान नहीं होते—उनके चित्तों में बड़ी विषमतायें पायी जाती हैं। उनके चित्तों की विषमता के कारण बोध कराने की रीति भी भिन्न भिन्न हो जाती है। यह तो मानी हुई बात है कि—श्रुति का तात्पर्य तो एक ही हो सकता है। फिर भी जो लोग उनका विरुद्ध अर्थ करके आपस में झगड़ते हैं, उसका कारण यह है कि ये लोग श्रुति के पूर्वापर का विचार न करके, उसके तात्पर्य को न समझ कर, भ्रम में पड़ जाते हैं। विवेकी लोग तो श्रुति के सम्पूर्ण तात्पर्य को समझ कर आनन्दसमुद्र में विहार करने लगते हैं। विवेकी लोगों का तो यह निश्चय होता है कि—यह मायारूपी मेघ जगत् रूपी जल को जब कभी इसके जी में आये, बरसाता फिरो। इसके बरसाने और उसके बरसने से, चिदाकाश की कुछ भी हानि या लाभ नहीं होता। यदि कोई इस प्रकरण में कही हुई प्रक्रिया का सदा ही विचार रक्खे तो वह अवश्य ही कूटस्थता का महालाभ करके छोड़े।