भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 655, कुल 726 में से

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ध्यानदीप का संक्षेप ६७ वेदान्तों के द्वारा अखण्ड एक रसात्मक तत्व को परोक्ष रूप से जान कर उपासक लोग 'अहं ब्रह्मास्मि' 'मैं ब्रह्मतत्व ही हूँ' इस प्रकार उपासना करने लगते हैं। यहाँ पर परोक्ष ज्ञान का अभि- प्राय यही है कि—अभी उसे प्रत्यग्व्यक्ति दीखने नहीं लगी है, केवल शास्त्र के कहने से 'ब्रह्म है' ऐसा एक सामान्य ज्ञान उसे हो गया है। केवल परोक्षता रूपी इस कमी से ही उसे 'अतत्व- ज्ञान' कह देना ठीक नहीं है। क्योंकि उसका ऐसा स्वरूप भी तो अध्यात्मशास्त्र ने ही बताया है। इस कारण जब शास्त्रीय रीति से उस सच्चिदानन्द तत्व का निश्चय होता है तब परोक्ष होने पर भी वह ज्ञान तत्वज्ञान ही रहता है, भ्रम नहीं हो जाता। शास्त्रों ने तो यद्यपि महावाक्यों के द्वारा ब्रह्म को प्रत्यक् ही बताया है और वह है भी ऐसा ही, परन्तु जो लोग विचार नहीं करते, उनकी समझ में यह बात आनी बड़ी ही कठिन है कि वह ब्रह्म- तत्व हमारा आपा ही है। देहादि को आत्मा मानने का भ्रम जब तक जाग रहा है, तब तक कोई भी पुरुष, मन्दबुद्धि होने के कारण, ब्रह्मतत्व को आत्मा जान ही नहीं सकता। जो श्रद्धालु है, जो शास्त्रदर्शी है, उसको ब्रह्म का 'परोक्ष ज्ञान' हो जाना तो बहुत ही सुकर है। अद्वैत के इस ऐसे परोक्ष ज्ञान को द्वैत का प्रत्यक्ष ज्ञान नष्ट नहीं कर सकता है। लोक में देखा जाता है कि—प्रत्यक्ष शिलाबुद्धि परोक्ष ईश्वरभाव को हटाती ही नहीं है। बताओ ? कि—प्रतिमा आदि के विष्णु होने में किस श्रद्धालु को संदेह होता है। अश्रद्धालु लोग इस बात पर भले ही विश्वास न करें, उनका उदाहरण देना यहाँ ठीक नहीं है। क्योंकि वैदिक बातों में केवल श्रद्धालु लोगों को ही अधिकार है। परोक्ष ज्ञान तो एक बार के आप्तोपदेश से ही उत्पन्न हो जाता है। आप्त