भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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६८ पंचदशी के मुख से सुन कर जैसे कर्मानुष्ठान किया जा सकता है उस तरह आप्त की बात सुनते ही किसी को ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं हो जाता है उसके लिए तो उसे फिर फिर विचार करना पड़ता है। परोक्ष ज्ञान को रोकने वाली तो अश्रद्धा है, और कुछ नहीं। तथा अपरोक्ष ज्ञान का प्रतिबन्ध केवल अविचार ही किया करता है। विचार करने पर भी यदि किसी को ब्रह्मात्मता का परिज्ञान न हो सके, तो उसे बार बार विचार करते ही जाना चाहिये। उसे समझ लेना चाहिये कि अभी विचार में कोई कमी रह गयी होगी। क्योंकि अपरोक्षज्ञान के होते ही विचार अपने आप रुक जायगा। विचार की समाप्ति ही अपरोक्षज्ञान का अचूक चिह्न माना गया है। यदि मरण पर्यन्त विचार कर डालने पर भी किसी को आत्म- लाभ न हो तो उसे उसके प्रतिबन्धों का क्षय हो जाने पर जन्मान्तर में आत्मलाभ हो ही जायगा। व्यासमुनि ने भी कहा है कि— इस जन्म या परजन्म में भी विद्या हो जाती है। कठ श्रुति में भी कहा है कि बहुत से लोगों को तो सुनकर भी इस आत्म तत्व का ज्ञान (इस जन्म में) नहीं हो पाता। वामदेव को तो गर्भ में आत्मतत्व का ज्ञान हुआ था। लोक में भी देखते हैं कि—बहुत बार याद करने पर भी जो बात याद नहीं होती वही बात अगले दिन बिना याद किये याद आ जाती है। खेती और गर्भ जैसे उसी दिन तैयार नहीं हो जाते इसी प्रकार आत्मविचार उसी दिन अन्तिम श्रेणी पर नहीं पहुँच जाता। किन्तु धीरे धीरे पका करता है। बार बार विचार करने पर भी जब तत्व ज्ञान न हो तो समझ लेना चाहिये कि भूत, भावी या वर्तमान कोई सा प्रतिबन्ध होगा, जो कि ज्ञान को होने नहीं देता। इन तीनों में से कोई सा प्रति- बन्ध हो तो वेदपारंगत लोग भी मुक्त नहीं होते हैं। इसी अभि-