पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 658, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंकारण उनका विचार निरर्थक नहीं हो जाता है । ज्यों ही उनका प्रतिबन्ध हटता है त्यों ही उन्हें आत्मज्ञान हो जाता है । गीता में यह भी कहा है कि—योगभ्रष्ट लोगों को आत्मविचार के प्रभाव से पुण्यकारी लोगों को मिलने वाले स्वर्गादि लोक मिलते हैं । फिर भी यदि कोई अभिलाषा रह गयी हो तो वे पवित्र श्रीमानों के कुल में जन्म लेते हैं [ और वहां अपनी अभिलाषा को पूरा कर लेते हैं । ] यदि वे आत्म तत्व के विचार के प्रभाव से निःस्पृह हो गये हों तो लौटकर योगियों के कुल में ही जन्म लेते हैं । किन्तु ऐसा जन्म बड़ा ही दुर्लभ होता है। यह थोड़े पुण्यों से किसी को नहीं मिलता । क्योंकि ऐसा योगभ्रष्ट इस कुल में आते ही उसी पहले वाले बुद्धिसंयोग को पा जाता है । वैसा 'बुद्धियोग' उसे योगी मां- बापों से दायभाग के रूप में मिल जाता है । फिर तो वह पहले से भी दूने उत्साह से प्रयत्न करने लग पड़ता है । उसका पूर्वा- भ्यास उसे बलात् अपनी ओर खेंच ले जाता है । यों सिद्ध होने में अनेक जन्म लग जाते हैं । यदि तो किसी को ब्रह्मलोक को पाने की इच्छा हो और वह उसे वहीं दाबकर—तत्त्वज्ञान से उसको न उखाड़ कर—आत्मविचार करने लगे तो वह भी साक्षा- त्कार नहीं कर पाता । वह फिर कल्पान्त के समय इस जगत् के समष्टि अभिमानी के साथ मुक्त होता है,ऐसा शास्त्र का अभिप्राय है। कई तो ऐसे होते हैं कि उनके सांसारिक धन्धे उन्हें अपने आपे के विचार का अवसर ही नहीं आने देते। इस शरीर की दासता और मन की चाकरी में यदि उनके आठों पहर बीत जायँ तो वे घब- राते नहीं। परन्तु जिसकी कृपा से यह मट्टी का पुतला चलता फिरता है, उस अन्दर छिपे हुए प्राणाधीश की मीमांसा के लिये उन्हें एक क्षण का भी अवकाश नहीं मिलता । इतनी ही क्यों !