पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 659, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीप का संक्षेप ७१ जो लोग इस आत्मतत्व का विचार करते हैं उन्हें वे निकम्मा और मूढ़ समझते हैं। वे उनके सहवास को भी यथाशक्ति टाला करते हैं। ऐसे लोगों को ध्यान में रखकर ही तो कठ में कहा है कि बहुत से पापियों को तो वह परात्मतत्व सुनने को भी नसीब नहीं होता। जिस श्रद्धालु की बुद्धि अतिमन्द हो, जिसे अध्यात्मदर्शी गुरु हाथ न लगे, या अनुकूल देश कालादि न मिल सके, वह इतना ही करे कि दिन रात ब्रह्मोपासना (प्रणवाभ्यास) ही करता रहे। निर्गुण ब्रह्म की उपासना की रीति यह है कि उसके ज्ञान को बार बार दोहराता रहे। शैव्य प्रश्न के उत्तर में तापनीय उपनिषत् में निर्गुणोपासना का कथन किया है। प्रश्न उपनिषत् में त्रिमात्र ओंकार की उपासना का वर्णन आया है। कठ और माण्डूक्य में भी इसी निर्गुणोपासना का समुल्लेख पाया जाता है। निर्गुण उपा- सना को कैसे करें ? यह यदि जानना हो तो आद्य शंकराचार्यजी के पंचीकरण नाम के पुस्तक को देखना चाहिये। एक बात इसमें ध्यान रखने योग्य है कि सारी शाखाओं में निर्गुण ब्रह्म के जितने गुण आये हैं, उन सब का उपसंहार इस उपासना में कर लेना चाहिये। उसमें 'आनन्द' 'सत्' 'चित्' 'पूर्ण' आदि जितने विधेय गुण हैं या अस्थूल अनणु, अह्रस्व, अदीर्घ आदि जितने भी निषेध्य गुण हैं उन सभी का उपसंहार इसमें साधक को कर लेना चाहिये। ऐसा न हो कि किसी एक प्रकरण में जिन गुणों का वर्णन आया है केवल उन्हीं गुणों के आधार पर इस उपासना को करने लगें। उपासना करते हुए यह कभी न भूलें कि आनन्द आदि विधेय और अस्थूलादि निषेध्य गुणों से एकमात्र अखण्ड आत्मतत्व ही लक्षित होता है। इन सबसे जो तत्व लक्षित होता है 'वही तत्व