पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 660, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ पञ्चदशी मैं हूँ' ऐसा ध्यान साधक को यथाशक्ति आठों पहर रहना चाहिये । अब बोध और उपासना का भेद भी सुन लीजिये—बोध तो वस्तु के अधीन होता है। इसके विपरीत उपासना उपासक के हाथ की बात होती है। बोध की उत्पत्ति विचार से होती है— साधक न भी चाहे तो भी वस्तु के सामने आने पर बोध होता ही है। उसे वह रोक नहीं सकता। वह बोध रूपी दिवाकर जब उदय होता है तब इस सब संसार की सत्यता को भस्मसात् करके छोड़ता है। जब इतना हो चुकता है तब साधक कृतकृत्य हो जाता है। उसके बाद उसे नित्य तृप्ति रहने लगती है। अब वह जीवन्मुक्त हो जाता है। अब तो वह प्रारब्धक्षय की बाट जोहने लगता है कि 'यह कब समाप्त होगा' । ऐसा परमपद यदि किसी को पाना हो तो वह गुरु के उप- देश पर विश्वास करे। उस पर किसी प्रकार का भी संशय न करे और अपने उपास्य का निरन्तर ऐसा विचार करे कि—इस चिन्तन के बीच में, अन्य किसी भी विषय का विचार तक न आने दे। चिन्ता करते करते अन्त में ऐसी अवस्था आ जायगी कि साधक को स्वयं ही यह भान होने लगेगा कि ओहो ! यह चिन्त्यस्वरूप तो मैं ही हूँ। यहां पहुंचते ही साधक का चिन्तन भी छूट जायगा। फिर यह प्रयत्न करना चाहिये कि किसी तरह मरणपर्यन्त यही धारणा बराबर बनी रहे। क्योंकि उपासना पुरुष के अधीन होती है। कोई चाहे उसे करे, चाहे न करे, या जैसे जी में आये कुछ का कुछ किया करे। इस कारण उपासकों से यह बात विशेषरूप से कह देना चाहते हैं कि वे इस उपासना को सदा ही किया करें। सुपने में भी वेदपाठ करने वाले वेदपाठी का या सुपने में जप करने वाले जपिता, का जो हाल हो जाता