पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 661, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीप का संक्षेप ७३ है वही हाल उपासक का हो जाना चाहिये । उपासना की ऐसी प्रगाढता तो तभी होगी जब कि विरोधी विचारों को छोड़ कर निरन्तर भावना की जायगी और वासना का आवेश बढ़ने लगेगा । ऐसी उपासना सर्वपरित्यागी संन्यासमार्गी लोग ही कर सकते हों, यह धारणा ठीक नहीं है । क्योंकि इस उपासना में आस्था की अधिकता जब हो जायगी तब विषयव्यसनी की तरह, अपने प्रारब्ध भोगों को भोगते हुए भी, अपना लोकव्यवहार करते हुए भी, यह उपासना बराबर चल ही सकेगी । देखते हैं कि जिस नारी को परपुरुषसंग का व्यसन पड़ जाता है, वह घर के कामों में उलझी रहने पर भी, अन्दर मन में तो उसी परसंग रसायन को चखती रहती है । ऐसा करते हुए भी उसके घर के काम काज बराबर चलते ही हैं । हां, इतना तो अवश्य हो जाता है कि उसके घर के काम ऊपर के मन से होने लगते हैं । इसी प्रकार उपासना में निष्ठावाले पुरुष, ऊपर के मन से तो संसार के काम काज निभाते रहें । हम उनके ऊपर के मन को छीनना नहीं चाहते । हमें तो वे अन्दर का मन ही दे दें । अन्दर के मन से तो वे आठों पहर अखण्डोपासना-रूपी दीपक को जगाते रहें । जिस तत्वज्ञानी ने यह समझ लिया है कि—यह प्रपंच तो मायामय है, आत्मा तो केवल चैतन्य रूप है, फिर बताओ, उसे व्यवहार में क्या उलझन होगी ? व्यवहार को यह ज़रूरत तो है ही नहीं कि—यह प्रपंच सच्चा ही हो और न व्यवहार को यही दरकार है कि आत्मा जड ही हो,तब ही उसका काम चले, किन्तु इस विचारे [व्यवहार] को तो केवल साधनों की ही ज़रूरत होती है। देखो व्यवहार के साधन जो मन, वाणी, शरीर अथवा ये बाह्य पदार्थ हैं, इनको तत्वज्ञानी तोड़ फोड़ कर तो फेंक ही नहीं