पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंका भी तो दर्शन आकाश के समान ही नहीं होता है क्योंकि] हम राजयोगी लोग चुपचाप बैठकर जब निश्चिन्त हो गये होते हैं तब उस शुद्ध सद्वस्तु का अनुभव किया ही करते हैं। मौन हो जाने के समय, और किसी की प्रतीति न होने से शून्य ही रह गया है, ऐसा मानना ठीक नहीं। क्योंकि शून्य को भी तो शून्य की प्रतीति नहीं हो सकती ? इस कारण वह प्रतीत होने वाला जो पदार्थ है वह शून्य नहीं हो सकता। वह तो सद्वस्तु ही है। 'निश्चिन्तैः' के स्थान पर “निश्चिन्तैः” पाठ प्रतीत होता है। इस में ध्यान देने की बात यह है कि सम्पूर्ण दृश्यों को छोड़ चुकने के बाद गम्भीर विचार करें तो शून्यावस्था की प्रतीति होने लगती है और इस शून्य अवस्था से प्रायः साधक लोग घबरा जाते हैं। इस में उन का जी नहीं लगता। परन्तु ऐसे समय अत्यन्त सावधान हो कर इस शून्य अवस्था का ज्ञान कराने वाले ज्ञानरूप साक्षी आत्मा तक पहुँचना चाहिये। इस शून्य में ही नहीं रुक जाना चाहिये। इस शून्य तथा इस शून्य को पहचानने वाले साक्षी में राजहँस की तरह विवेक कर लेना चाहिये। इस साक्षी को यदि आप भुला डालेंगे तो अवश्य ही शून्य ही शून्य दिखाई देगा। जो आत्मा नहीं है वह शून्य तो है ही। परन्तु आप ध्यान रक्खें कि शून्य को तो शून्य का ज्ञान हो ही नहीं सकता। इस शून्य का ज्ञान जिस को हो रहा है, वही तो हम राज- योगियों की प्यारी सद्वस्तु है। सद्बुद्धिरपि चेन्नास्ति मास्त्वस्य खप्रभत्वतः । निर्मनस्कत्वसाक्षित्वात् सन्मात्रं सुगमं नृणाम् ॥४५॥ यदि कहो कि समाधि अवस्था में तो सद्बुद्धि भी नहीं रह