पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४९ जाती है [उस समय तो यह भी खयाल नहीं रहता है कि सत् नाम की भी कोई वस्तु इस संसार में है] तो इसका समाधान यह है कि यदि उस समय सद्बुद्धि नहीं रहती है तो भले ही न रहे। यह सत् तत्व तो एक स्वयंप्रकाश पदार्थ है। उस के विषय की बुद्धि न रहने पर भी उस का ज्ञान होने की रीति यह है कि] वह सद्वस्तु तो उस समय [समाधि अवस्था] की निर्मनस्कस्थिति का साक्षी है। इस कारण सन्मात्र वस्तु का परिज्ञान होना मनुष्यों को बड़ा ही, सुगम है। निर्मनस्क अवस्था को जो जानता रहता है वही सद्वस्तु है। मनोजृम्भणराहित्ये यथा साक्षी निराकुलः । मायाजृम्भणतः पूर्वं सत्तथैव निराकुलम् ॥४६॥ मनोव्यापार जब नहीं होते, तब जैसे साक्षी [आत्मा] निराकुल होता है, इसी प्रकार [सृष्टि की उत्पत्ति से पहले] जब माया का जृम्भण ही नहीं हो पाया था—यह सद्वस्तु भी निरा- कुल ही थी यह बात जानी जा सकती है। निस्तत्त्वा कार्यगम्यास्य शक्तिर्मायाग्निशक्तिवत् । न हि शक्तिः क्वचित् कैश्चिद् बुध्यते कार्यतः पुरा ॥४७॥ पृथक् तत्व रहित तथा कार्यों को देखकर ही पहचानने योग्य जो इस सद्वस्तु की शक्ति किंवा सामर्थ्य है उस को ही 'माया' कहते हैं। वह माया ऐसी है जैसी अग्नि की शक्ति। क्योंकि कहीं भी कोई शक्ति को कार्य की उत्पत्ति से प्रथम नहीं जान सकता। [अब माया का लक्षण बताया जाता है कि जगत् के कारण सद्वस्तु से पृथक् जो कोई भी तत्व नहीं होती है तथा आकाशादि कार्यों को देखकर ही जिस का अनुमान कर सकते हैं, आकाशादि