भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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७६ पंचदशी

होती, सब कुछ जानने के कारण ज्ञानी के लिये भी विधि नहीं रहती। सम्पूर्ण विधियों का बोझ तो अल्पज्ञ के कन्धों पर ही लदा रहता है। एक प्रासंगिक बात यह भी जानने योग्य है कि किसी किसी ज्ञानी में शाप और वरदान का सामर्थ्य भी पाया जाता है। सो यह सामर्थ्य किसी दूसरे तप से उनमें आता है। ज्ञान को उत्पन्न करने वाले तप से यह सामर्थ्य उत्पन्न होता ही नहीं। ऐसी अवस्था में जिन ज्ञानियों में शाप या वरदान का सामर्थ्य नहीं है, उनके ज्ञानी होने की शंका नहीं करनी चाहिये। प्रकृत बात तो यही कह रहे थे कि लौकिक व्यवहार जिन साधनों से चला करता है, तत्वज्ञान के हो जाने पर उन साधनों का उपमर्द ( नाश ) नहीं हो जाता, इस कारण ज्ञानी लोग राज्यादि जैसे बड़े से बड़े आरम्भ भी भले प्रकार निभा ही सकते हैं। उनको मिथ्या समझने से यदि किसी की इच्छा ही उधर को न चलती हो तो वह भले ही ध्यान करने लगे और व्यवहार को बन्द कर दे। यह सब ज्ञानी के प्रारब्ध पर ही निर्भर होता है। इसके विप- रीत उपासक को तो चाहिए कि वह तो सदा ध्यान ही करता रहे। इसे तो यह कभी भी न भूलना चाहिए कि उस (उपासक) की ब्रह्मता तो केवल ध्यान के प्रताप से ही होती है। जो चीज़ ध्यान से बनी है वह तो ध्यान के हटते ही नष्ट हो जायगी। परन्तु सच्ची ब्रह्मता तो जब उसका ध्यान नहीं भी रहता तब भी बनी ही रहती है। इसलिए ज्ञान तो उसका बोधक ही हो सकता है, जनक नहीं हो सकता। ज्ञापक के न रहने से सत्य वस्तु छिप नहीं जाती। वैसे तो उपासक भी ब्रह्म ही है, परन्तु अभी तक उस को इस बात का निश्चय नहीं हो पाया है, इस कारण उस की ब्रह्मता उस के उपयोग में नहीं आती। जैसे भूखों मरने से भीख