भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 726 में से

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ध्यानदीप का संक्षेप ७७ मांगना भला होता है, इसी प्रकार और सब कामों से उपासना का दर्जा ऊँचा है। पामर लोगों के व्यवहार से तो यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान बेहतर है, उन यज्ञादियों से सगुणोपासना श्रेष्ठ है, सगुणोपासना से भी निर्गुणोपासना ऊँची मानी गयी है। इस ऊँचनीच भाव का निर्णायक आधार पूछो तो यह है कि ज्यों ज्यों विज्ञान की समीपता आती जाती है, त्यों त्यों श्रेष्ठता भी बढ़ने लगती है। निर्गुणोपासना के सर्वश्रेष्ठ होने का कारण तो यही है कि यह उपासना पीछे जाकर धीरे धीरे ब्रह्मज्ञान के रूप में बदल जाती है। फल मिलने के समय जैसे सफल भ्रम प्रमाज्ञान होजाता है इसी प्रकार मुक्ति का समय आने पर यह 'निर्गुणोपासना' ही 'ब्रह्मविद्या' बन जाती है। निर्गुणोपासना में यही विशेषता है कि वह ज्ञान के सब से अधिक समीप होती है। वह निर्गुणोपासना जब पकने लगती है तब पहिले तो इसी की 'सविकल्प समाधि' हो जाती है। फिर पीछे से उस सविकल्प समाधि की ही 'निर्विक- ल्पसमाधि' बन जाती है। यह निरोध नामक समाधि निर्गुणोपासक को अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जब किसी को निरोध का महालाभ हो जाता है, तब उस पुरुष के अन्दर असंग वस्तु शेष रह जाती है। उस असंग वस्तु की भावना यदि कोई बार बार करे तो 'तत्वमसि' आदि वाक्यों के याद आते ही बिजली की चमक की तरह तत्वज्ञान का उदय हो जाता है। उस समय की ज्ञानोन्मुख अवस्था की सराहना किन शब्दों में करें—उस समय ही निर्विकारता, असंगता, नित्यता, स्वप्रकाशता, एकता और पूर्णता आदि का सच्चा भाव अभ्यासी की बुद्धि में ठीक तौर पर जंचने लगता है। इन का यथार्थ मर्म तभी अभ्यासी की समझ में आता है। अपरोक्षज्ञान को उत्पन्न करने वाली इस निर्गुणोपासना को