भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 726 में से

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ब्रह्मानन्दन्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १११ प्रतीत हो जाते हैं परन्तु तब ये दोनों एक ही पदार्थ दीखते हैं । रजोवृत्तियों के मलिन होने के कारण, इनमें सुख भाग के दर्शन नहीं हो पाते । लोक में देखते हैं कि इमली का फल बहुत खट्टा होता है, परन्तु नमक मिलाने पर उसकी खटाई छिप जाती है इसी तरह रजोवृत्तियों के मिश्रण से आनन्द छिप जाता है । अब एक बड़ा गम्भीर प्रश्न यह होता है कि यों प्रियतम होने के कारण आत्मा की परमानन्दरूपता जान भी ली जाय तो भी ऐसे थोथे 'विवेक' से क्या होगा ? मुक्ति का साधन-योग जब तक न किया जायगा, तब तक अपरोक्ष ज्ञान कैसे हो सकेगा ? इस का उत्तर यही है कि—जो फल 'योग' से मिलना है वही फल इस 'विवेक' से भी मिल जायगा । गीता में तो स्पष्ट ही कहा है कि—'सांख्यमार्गी' को जो स्थान मिलता है 'योगी' भी उसे ही पाते हैं । जानने योग्य बात इस प्रसंग में इतनी ही है कि किसी के लिए योग मार्ग से चलना असाध्य होता है और किसी को ज्ञान का निश्चय होना असम्भव हो जाता है । मनुष्य स्वभाव की इन कमजोरियों को जानने वाले परमेश्वर ने इसीलिए 'योग' और 'सांख्य' [ विवेक ] नाम के दो मार्ग कह दिये हैं । 'योगी' और 'विवेकी' दोनों को ही एक समान ज्ञान हो जाता है । दोनों एक समान ही रागद्वेष से हीन होते हैं । देह के प्रतिकूल पदार्थों से द्वेष भी दोनों को समान ही होता है । व्यवहार काल में द्वैत का भान जैसे 'योगी' को होता है, वैसे ही 'विवेकी' को भी हुआ करता है । समाधि करते समय 'योगी' को द्वैत का भान जैसे नहीं होता वैसे ही जब 'विवेकी' अद्वैततत्व का विवेक करने बैठता है तब उसे भी द्वैत का भान नहीं होता । जो सदा आत्मा- नन्द को देखने लगा है, जिसे द्वैत का दीखना ही बन्द हो चुका

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