भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 701, कुल 726 में से

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[ १३ ] ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप 'ब्रह्मानन्द' के प्रथम अध्याय में जिसे 'योगानन्द' कहा था उसी को आत्मानन्द' समझना चाहिए। दो अध्यायों को देखकर उसमें भेद मानना ठीक नहीं है। इस प्रतीयमान भेद का कारण तो यह है कि वह 'ब्रह्मानन्द' जब योग के द्वारा साक्षात्कार में आता है तब उसे 'योगानन्द' कह देते हैं, जब , तो इस योग की विवक्षा नहीं रहती तब तो सीधे सादे उपाधिरहित शब्दों में उसे 'ब्रह्मानन्द' या 'निजानन्द' ही कहने लगते हैं। इसी प्रकार गौण आत्मा कौन है ? मिथ्या कौन से हैं ? मुख्य आत्मा किसे सम- झना चाहिए ? इस प्रकार के आत्मविवेचन के बाद जिस आनन्द का भान हुआ करता है उसे 'आत्मानन्द' कह दिया जाता है। असल में तो योगानन्द' और 'आत्मानन्द' एक ही है। जिस के द्वारा वह आनन्द प्रकट होता है उसी नाम से उस का नाम रख लिया गया है। अब विचार यह होता है कि—इस 'आत्मानन्द'के साथ तो पुत्र स्त्री आदि 'गौण आत्मा' देहेन्द्रियादि 'मिथ्या आत्मा' तथा आकाश आदि 'अनात्मपदार्थ' लगे ही हुए हैं। ऐसे सद्वितीय पदार्थ को हम 'ब्रह्मानन्द' कैसे मान लें ? क्योंकि 'ब्रह्मानन्द' तो अद्वितीय होना चाहिए। इसका उत्तर यह है-कि यह सब जगत् उस अद्वयानन्द से ही उत्पन्न हुआ है, इस कारण वह उससे पृथक् कुछ भी नहीं है—उससे पृथक् इसकी कोई भी सत्ता नहीं है—यों उस की अद्वितीयता इतने बखेड़े के बाद अब भी अक्षुण्ण बनी

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