भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 709, कुल 726 में से

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द १२१ मिट्टी के बने किसी भी पदार्थ को देखता है तब सभी को जान लेता है कि यह भी मिट्टी का बना है और यह भी मिट्टी का । इसी प्रकार ब्रह्मनाम के सर्वानुगत एक-तत्व का परिज्ञान जब किसी को हो जाता है, तब उसी से बने हुए इस सकल जगत् का ज्ञान भी उसे हो ही जाता है । ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूप है और यह जगत् नामरूपात्मक है । यहं जगत् पहले अव्याकृत था, इसे व्यक्त करते समय इसका कुछ 'नाम' और कुछ 'आकार' बना दिया गया है। अव्याकृत से हमारा अभिप्राय ब्रह्म में रहने वाली इस अचिन्त्य- शक्ति माया से ही है। अविक्रिय ब्रह्म में रहने वाली वह माया ही अनेक रूप हो जाती है—सबसे पहले उसका आकाश बनता है, वह भी 'अस्ति' 'भाति' और 'प्रिय' अर्थात् 'सत्' 'चित्' और 'आनन्द' स्वरूप ही होता है। उसका अपना खास रूप तो 'अव- काश' ही है। वही बिचारा मिथ्या है, वे तीनों [ सच्चिदानन्द ] मिथ्या नहीं हैं। इस अवकाश पर जरा विचार का प्रयोग करके देखिये—यह अवकाश व्यक्त होने से पहले नहीं था, नष्ट हो जाने के बाद भी यह अवकाश नहीं रहेगा। यह तो बीच में कुछ काल के लिये पानी के बुलबुले की तरह व्यक्त हो गया है। आदि और अन्त में न होने के कारण यह तो वर्तमान में भी नहीं है। परन्तु यह बात बुद्धियोग से ही जानी जा सकती है। ऊपर जिन सच्चिदा- नन्दों का वर्णन किया है वे घड़े आदि में मिट्टी की तरह सदा सब कार्यों में ही अनुगत रहते हैं। बताओ, जब तुम अवकाश को भूल जाते हो तब तुम्हें क्या भासा करता है। उस समय तुम्हें जो तत्व भासता है, उस तत्व को कुछ न कुछ तो कहना ही होगा। ऐसे समय उदासीनावस्था होने के कारण उस तत्व को 'सुख' ही कहना चाहिये। जो अनुकूल भी प्रतीत न हो और प्रतिकूल भी न लगे

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