पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 710, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ पञ्चदशी वही तो निजसुख होता है। जब कोई अनुकूल पदार्थ दीखता है तब हर्ष होता है, प्रतिकूल जान पड़े तब दुःख हो जाता है, जब तो अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो तब तो 'निजानन्द' का भान शुरू हो जाता है। यह निजानन्द एक स्थिर चीज है। हर्ष और शोक तो क्षण क्षण में बदलने वाले पदार्थ हैं। इन दोनों हर्ष शोकों को तो मानस ही मान लेना ठीक है। क्योंकि मन भी क्षणिक है। उसके परिवर्तन से ही हर्ष और शोक होते हैं। इतने विवेचन से आकाश में आनन्द होने की बात मन में बैठ गयी होगी। सत्ता और भान को तो सभी मानते हैं, इस कारण उसका वर्णन हम नहीं करेंगे। वायु से लेकर देहपर्यन्त पदार्थों में भी यह बात समझ लेना। गति और स्पर्श वायु के,दाह और प्रकाश अग्नि के, द्रवता जल का, और कठिनता भूमि का अपना निजी आकार है। इन सब के नाम तो अवश्य अनेक या विभिन्न हो रहे हैं, परन्तु इनमें सच्चिदानन्द तो एक रूप से ही रहते हैं। इनमें जो अलग अलग नाम और रूप [आकार] हैं वे निस्तत्त्व हैं। क्यों- कि इनके जन्म और नाश बराबर होते रहते हैं। अपने संस्कारी मन की सहायता से इन नामरूपों को समुद्र के बुलबुले की तरह समझा करो। ज्यों ही कोई अधिकारी इस सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदा- नन्द ब्रह्म को [ चाम की आँखों से नहीं अपितु ] बुद्धियोग से देख लेगा तब वह धीरे धीरे इन नामरूपों की अवहेलना स्वयमेव करने लगेगा। ज्यों ज्यों यह अवहेलना बढ़ने लगेगी त्यों त्यों ब्रह्म के दर्शन होने लगेंगे। और ज्यों ज्यों ब्रह्म के दर्शन होंगे त्यों त्यों नामरूप छूटने लगेंगे। इस ब्रह्माभ्यास [द्वैतावहेलना और ब्रह्म- दर्शन] से जब अधिकारी की 'विद्या' स्थिर हो जायगी तब वह इस जीवन के रहते ही मुक्त हो जायगा। फिर उसका शरीर प्रारब्धा-