भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[ १४ ] ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप योग से, आत्मा के विवेक से, अथवा द्वैत के मिथ्यापन की चिन्ता करने से, जब किसी को ब्रह्मानन्द दीखने लगा हो, तब उस समय के 'ज्ञानानन्द' का वर्णन इस प्रकरण में है। जिस प्रकार विषयानन्द एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति है इसी प्रकार यह विद्यानन्द [ज्ञानानन्द] भी एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति ही है। यह चार प्रकार का होता है, प्रथम दुःखाभाव, फिर कामाप्ति। फिर कृत-कृत्यता और उसके पश्चात् प्राप्तप्राप्यता। दुःख दो तरह का होता है—एक इस लोक का दूसरा परलोक का। बृहदारण्यक में कहा है कि ज्ञानानन्दी को ऐहिक दुःख नहीं रहते। ऐहिक दुख तो कामना ही है। परन्तु जब किसी को आत्मज्ञान हो जाय तब फिर वह किस चीज की चाहना से और किसके लिये शरीर के दुःखों से दुःखी होता फिरे ! पहले प्रकरणों में बता आये हैं कि जीवात्मा और परमात्मा ये दो भेद आत्मा के हैं। यह आत्मा तीनों देहों के साथ जब तादात्म्य कर बैठता है तब यह जीव बन जाता है और तब ही इसमें 'भोक्तापन' आ जाता है। उधर परात्मा का भी हाल सुन लीजिये—वह सच्चिदानन्द होकर भी जब नामरूप के साथ तादात्म्य करने की खिलवाड़ कर बैठता है तब 'भोग्य' हो जाता है। अब यदि 'भोक्ता' और 'भोग्यपन' के बखेड़े को हटाना चाहो तो उन तीनों शरीरों और उन नामरूपों से उस आत्मतत्व का विवेक कर डालो। भोक्ता और भोग्यपन को हटाकर शुद्ध के दर्शन करलो। यही तो होता है कि 'भोक्ता' के