भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दन्तर्गतं विद्यानन्द का संक्षेप · १२७ · लिये किसी 'भोग्य' पदार्थ को चाहता है तो [ शरीर के साथ ] दुःखी होने लगता है। क्योंकि ये तीनों शरीर तो ज्वरों [संतापों] के निवासमन्दिर ही हैं। आत्मतत्व को कभी कोई ज्वर नहीं होता। देखलो—वात, पित्त,कफ नामक धातुओं में जब विषमता आ जाती है तब इस स्थूल शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं। काम क्रोधादि विकार जब उदय हो जाते हैं तब ये ही सूक्ष्म शरीर में रहने वाले ज्वर कहे जाते हैं। परन्तु इन दोनों प्रकार के ज्वरों की जड़ तो कारण शरीर [अज्ञान] में ही रहती है। पिछले अद्वै- तानन्द प्रकरण में कही रीति के अनुसार जब परात्मतत्व को पह- चान लिया जायगा, तब ज्ञानी को सच्चा 'भोग्य' दीखेगा ही नहीं। फिर बताओ वह परात्मतत्व को जानने वाला ज्ञानी कौन से 'भोग्य' को चाह सकेगा ? आत्मानन्द प्रकरण में कही रीति से जीवात्मा के असंग कूटस्थ स्वरूप का निश्चय, जब हो जायगा तब 'भोक्ता' ही कोई न रहेगा । अब आप सावधान होकर विचार कीजिये कि 'भोग्य' और 'भोक्ता' दोनों ही विवेक की आंच के सामने मोम के पुतले की तरह पिघल गये हैं। शेष बचे हुए इस बिचारे जड देह को तो कोई ज्वर होना ही क्यों है। यहां तक ऐहिक दुःखों का विचार किया गया। अब आमु- ष्मिक दुःखों की पड़ताल भी कर लीजिये—पाप और पुण्यों की चिन्ता ही आमुष्मिक [पारलौकिक] दुःख होता है। पहले अध्याय में कह ही चुके हैं कि—ज्ञानी को पुण्य पाप की चिन्ता नहीं सताती जैसे कमल के पत्ते पर पानी नहीं चिपटता इसी प्रकार ज्ञान हो जाने के कारण, ज्ञानी में आगामी कर्मों का सम्बन्ध नहीं हो पाता। सरकण्डे की रूई जिस प्रकार क्षण भर में जल जाती है इसी प्रकार ज्ञानी के संचित कर्म ज्ञानाग्नि से सहसा जल जाते हैं। गीता में भी