भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १२९ पर शासन कर रहा हो, मनुष्यों को मिल सकने वाले सभी भोग प्राप्त हों, ऐसे तृप्त राजा को जो आनन्द मिलता है, उस आनन्द को एक ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी होने के नाते से ही पा लेता है। मर्त्य लोगों के भोगों की इच्छा इन दोनों को ही नहीं है, इस कारण दोनों को ही तृप्ति एकसी रहती है। हां, इतना भेद भी है कि राजा तो भोगों को पाकर निष्काम हो सका है। परन्तु दूसरे की निष्कामता तो अद्भुत ही ढंग की है। वह तो अपने विवेक के प्रताप से निष्काम हो गया है। क्योंकि वह श्रोत्रिय है, इस कारण वेद शास्त्रों में जो भोगों के दोष लिखे हैं उनका उसे पूरा पूरा ध्यान रहता है। देह के दोष, चित्त के दोष, तथा भोग्य पदार्थों के दोष, उसे सदा याद रहते हैं। कुत्ते ने जिस खीर को वमन कर दिया हो उसको जैसे कोई खाना नहीं चाहता, इसी प्रकार विवेकी पुरुष दुष्ट भोगों की कामना नहीं करता। यद्यपि श्रोत्रिय और राजा दोनों ही समान भाव से निष्काम हो गये हैं, परन्तु राजा उन साधनों का संचय करने में काफी तकलीफ़ उठा चुका है और अब भोगों के भावी नाश को याद करके भी डर रहा है। श्रोत्रिय को ऐसा कोई कष्ट उठाना नहीं पड़ता। यही कारण है कि श्रोत्रिय का आनन्द उस के आनन्द से अधिक है। एक यह भी बात है कि विवेकी को अब किसी ऊँचे पद की अभिलाषा नहीं रही है। राजा को तो यह भी आशा लगी हुई है कि यदि कोई इससे ऊँचा पद [गन्धर्व आदि का] हो तो वह भी मुझे मिल जाय तो अच्छा हो। सार्वभौम राजा से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त सभी उत्तरोत्तर पद की कामना किया करते हैं। परन्तु यह जो आत्मानन्द है यह मन वाणी से अगम्य है ! यही कारण है कि वह इन सबसे ऊँचा है। ये सब पदवी- धारी लोग जिस किसी सुख को चाहते या चाह सकते हैं, श्रोत्रिय