पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 718, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० पञ्चदशी
[ज्ञानी] को उन किसी भी सुखों की इच्छा तक नहीं होती—वह उन सब सुखों की ओर से पहले ही निःस्पृह हो गया होता है। सो उन सबको अलग अलग जितना सुख होता है उतना अकेले श्रोत्रिय को हो जाता है। वे सब उन उन कामनाओं को पूरा करके भी तो जब कुछ काल के लिये अपने आपको निःस्पृह कर लेते हैं तभी वे आनन्दी हो सकते हैं। उनकी यह निःस्पृहता उन उन काम- नाओं के अधीन होती है। उन उन कामनाओं के पूरा किये विना उन्हें आनन्द मिल ही नहीं सकता। इसके विपरीत विवेकी को तो कुछ कामना ही नहीं होती। वह तो सदा ही निःस्पृह बना रहता है। यों वह सदा ही आनन्द को लूटा करता है। इसी कारण विवेकी का दर्जा सबसे ऊँचा है। मनु ने भी कहा है कि जो तो इन सब कामों को प्राप्त करले और जो केवल इन्हें छोड़ ही भर दे, सब कामों के पाने से सबका परित्याग करने में बहुत बड़ा महत्व है। बस यही ज्ञानी की 'सर्वकामाप्ति' है। ज्ञानी की सर्वकामाप्ति की एक यह भी रीति है—कि जैसे वह अपने देह में आनन्दाकार बुद्धि का साक्षी होता है, इसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणियों के देहों में जो जो भोग भोगे जा रहे हैं और उनसे उनको जो जो आनन्द आ रहे हैं, उन सबका साक्षी बनना उसे आ जाता है। अथवा यों कहो कि उन सब भोगों का साक्षी बनकर उन सब भोगों को अकेला ही भोगने लगता है। इस रीति से भी ज्ञानी को 'सर्वकामाप्ति' हो जाती है। वैसे तो अज्ञानी भी सबका साक्षी होता है परन्तु इस निगूढ तत्व का ज्ञान न होने से उसे वैसी तृप्ति नहीं हो पाती। श्रुति ने तो यह बात स्पष्ट ही कही है कि—जो इस महातत्त्व को पहचान जाता है वही सब कामों को भोग सकता है। इस तत्व को न जानने वालों