भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १३३ स्नान शौच तथा भिक्षायात्रा जप या वेदान्त का पाठ किया करो, यह मेरी बुद्धि विष्णु का ध्यान करो या ब्रह्मानन्द में गोता लगाकर बैठ जाओ, मैं तो साक्षी हूँ मैं कुछ करता या करवाता नहीं हूँ। कृत- कृत्यता और प्राप्तप्राप्यता की खुशी जब उसके अन्दर नहीं समाती है तब मन में यह विचार किया करता है कि मैं धन्य हूँ क्योंकि मैं अपने नित्य आत्मतत्व को ठीक ठीक समझ गया हूँ। मैं धन्य हूँ क्योंकि मुझे आज स्पष्ट ही ब्रह्मानन्द समुद्र दीख पड़ रहा है। मैं धन्य हूँ क्योंकि मुझे आज कोई भी सांसारिक दुःख दीखता नहीं है। मैं धन्य हूँ क्योंकि आज मेरा अज्ञान दिगन्त को पलायन कर गया है। मैं धन्य हूँ क्योंकि जो मुझे प्राप्तव्य था वह आज सभी सिद्ध हो गया है। मैं धन्य हूँ क्योंकि आज मेरे समान धन्य कौन निक- लेगा ? मैं धन्य हूँ मैं धन्य हूँ मैं वार वार धन्य हूँ। ओहो ! आज मेरे पुण्यों के ढेर एक साथ ही फल पड़े हैं। पुण्यों की इस महती सम्पत्ति के कारण आज मैं कृतकृत्यता की झूल में पड़ा हुआ झोटे ले रहा हूँ। मुझे ज्ञान कराने वाले शास्त्र, मुझे मार्ग दिखाने वाले गुरु, मेरा वह ज्ञान और मेरा वह आनन्द जिनके कारण आज यह धन्य अवस्था मुझे हाथ आयी है, सभी धन्य हैं। वे सबके सब आज मुझे मेरा पद देकर समुत्तीर्ण हो गये। उनकी महिमा गाने के लिये मैं शब्दों को कहां से लाऊँ ? ऊपर कहा हुआ ऐसा विद्यानन्द (ज्ञानानन्द) जब तक न उमड़ पड़े तब तक ब्रह्माभ्यास करते ही जाना चाहिये।

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