पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 722, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १५ ] ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप अब ब्रह्मानन्द के ही एक अंश बने हुए विषयानन्द का निरू- पण इसलिये करेंगे कि वह भी तो ब्रह्मज्ञान को समझने का ही एक लौकिक द्वार है। श्रुति ने स्वयं उसको ब्रह्मानन्द का ही एक अंश बताया है। वह कहती है कि—शेष सब प्राणी उसी ब्रह्मानन्द की मात्रा [कण] को चाट रहे हैं। मन की 'शान्त' 'घोर' तथा 'मूढ़' ये तीन तरह की वृत्तियां होती हैं। वैराग्य, क्षमा, उदारता आदि 'शान्त' वृत्तियां कहाती हैं। तृष्णा, स्नेह, राग तथा लोभ आदि 'घोर' वृत्तियां मानी जाती हैं। सम्मोह और भय आदि 'तामस' वृत्तियां बतायी जाती हैं। इन सभी वृत्तियों में ब्रह्म का केवल चित्स्वभाव आ गया है। शान्तवृत्तियों में इतनी और अधिकता है कि इनमें ब्रह्मतत्व का सुख भी प्रतिबिम्बित हो गया है। 'रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव'इत्यादि श्रुतियों का भी यही अभिप्राय है कि वह आत्मतत्व किसी में चैतन्य रूप से और किसी में चैतन्य तथा सुख दोनों रूपों से और किसी में सत्ता चैतन्य और सुख तीनों रूपों से समाकर उन उनके प्रतिरूप बन गया है। यह भी कहा है कि—भूतात्मा एक ही है वही सब भूतों में व्यवस्थित हो रहा है। वह एकरूप से उन्हें दीखता है जो ज्ञानी हों। परन्तु जिन्हें तत्व का पता नहीं होता उन्हें तो वह जलों के चाँदोंने की तरह बहुत रूपों में दीखा करता है। कीचड़ वाले जल में वही चांद अस्फुट दीखता है, निर्मल जल में वही चांद सुस्पष्ट दीखने लगता है। ठीक उसी प्रकार ब्रह्मतत्व भी शुद्ध और अशुद्ध