पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 725, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप १३७ माया का राज्य विस्तृत हो रहा है । बुद्धि की जो शान्त वृत्तियां हैं उनके साथ एकता को प्राप्त हुआ हो जाने से उसको 'मिश्रब्रह्म' कहा है । ब्रह्म की स्थिति तो हमने साफ़ साफ़ समझा दी है । अब जो कोई पुरुष ब्रह्म का ध्यान करना चाहे, वह नृशृंग आदि जैसे पदार्थों की तो उपेक्षा करता जाय और फिर जो तत्व शेष रह गया हो, उसी का यथायोग्य रीति से ध्यान करे । वह यों कि—शिला आदियों में नाम और रूपों [आकारों] को छोड़कर केवल सन्मात्र की ही चिन्ता किया करे । घोर और मूढ बुद्धियों के दुःख-भाग को छोड़कर उनमें के सत् और चित् के चिन्तन में लग जाय । शान्त वृत्तियों में तो सच्चिदानन्द नामक तीनों की ही चिन्ता करने लगे । ये उक्त तीन प्रकार की चिन्तायें क्रम से 'कनिष्ठ' 'मध्यम' और 'उत्कृष्ट' चिन्ता कहाती हैं । जिन मन्दलोगों को निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का अधिकार ही नहीं है, वे लोग व्यवहार काल में भी मिश्र ब्रह्म का चिन्तन करें, तो उनके लिये यही उत्कृष्ट बात है। ऐसा मिश्रब्रह्मचिन्तन बताने के लिये ही विषयानन्द नाम का यह प्रकरण लिखा गया है । उदासीन अवस्था में जब बुद्धिवृत्ति ढीली पड़ जाती हैं, तब तो विना वृत्ति का ध्यान होने लगता है। वह ध्यान सब ध्यानों से ऊँचे दर्जे का है। इस विषयानन्द नाम के प्रकरण में यहां तक चार प्रकार का ध्यान बताया जा चुका । तीन तरह का तो सवृत्तिक ध्यान तथा एक विना वृत्ति का ध्यान, यों चार प्रकार का ध्यान हो गया । जड पदार्थों में सत्ता, मूढ़वृत्ति में सत्ता तथा चैतन्य, सात्विकवृत्ति में सत्ता चैतन्य तथा आनन्द, यों तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान हो जाता है।