पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ पञ्चदशी इस ब्रह्मानन्द नाम के पांच अध्याय वाले ग्रन्थ में 'ज्ञान' और 'योग'के द्वारा जिस ध्यान का वर्णन किया है, वह ध्यान तो ब्रह्मविद्या ही है। उसका वर्णन तो हमने यों किया है कि ध्यान से जब चित्त एकाग्र हो जाता है तब उस चित्त में ब्रह्मविद्या स्थिर हो जाती है। ब्रह्मविद्या के स्थिर हो जाने पर ये 'सत्' 'चित्' 'आनन्द' पहले की तरह अलग अलग नहीं दीखते। तब तो ये अखण्ड एकरस होकर दीखने लगते हैं। क्योंकि उस समय भेद करने वाली उपाधियां नहीं रहतीं। भेद करने वाली उपाधियें तो ये शान्त घोर वृत्तियां और शिलादि पदार्थ ही हैं। इन उपाधियों को यदि कोई हटाना चाहे तो 'योग' या 'विवेक' से ही ऐसा कर सकता है। जब उपाधिरहित स्वयं प्रकाश अद्वैत ब्रह्मतत्त्व भासने लगता है तब यह प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाली त्रिपुटी नहीं रह जाती। यही कारण है कि तब उसे 'भूमानन्द' भी कह देते हैं। ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का वर्णन समाप्त हुआ। मन्दाधि- कारी लोग इसी को द्वार बनाकर आत्मधाम में घुस जांय।