पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५७ यह एक सर्वलोकप्रसिद्ध न्याय है। [इसी से समझ लनो कि माया से विपरीत प्रतीति हो जाती है।] एवं श्रुतिविचारात् प्राग्यथा यद्वस्तु भासते। विचारेण विपर्येति ततस्तच्चिन्त्यतां वियत् ॥६६॥ इस प्रकार यह निश्चय होगया कि श्रुति का विचार करने से पहले पहले जो वस्तु जैसी प्रतीत होती है, वह विचार करने पर वैसी नहीं रह जाती। इसी से उस आकाश का चिन्तन करो कि वह असल में क्या है। उस विपरीतभान की निवृत्ति का उपाय अब बताया जाता है—इस प्रकार श्रुति के अर्थों का विचार न करने तक जो वस्तु [जो सद्रूप ब्रह्म] भ्रान्ति के प्रताप से जैसी [आकाशादि के रूप में] हो गई है, वही वस्तु श्रुति के अर्थ का पर्यालोचन करने पर विपरीत हो जाती है—किंवा आकाशादि भाव को छोड़ कर फिर वही सद्रूप ब्रह्म ही हो जाती है। श्रुति का विचार करने पर ही वस्तु के यथार्थ रूप का परिज्ञान हो सकता है। इसी से कहते हैं कि आकाश का चिन्तन करो। विचार के द्वारा उसके पारमार्थिक रूप को टटोल लो। देखो कि विचार करने पर आकाश का पारमार्थिक रूप क्या सिद्ध होता है। भिन्ने वियत्सती शब्दभेदाद् बुद्धेश्च भेदतः । वाय्वादिष्वनुवृत्तं सन्नतु व्योमेति भेदधीः ॥६७॥ आकाश और सत् भिन्न-भिन्न हैं। क्योंकि इन दोनों के वाचक शब्द भी भिन्न-भिन्न हैं, तथा इन शब्दों से उत्पन्न होने वाली बुद्धियें भी भिन्न-भिन्न होती हैं। देख लो कि सत् वस्तु तो वायु आदि में भी अनुवृत्त हो रही है