भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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५८ पञ्चदशी ‘सत् वायुः’ ‘सत्तेजः’ ‘वायु है’ ‘तेज है’ इत्यादि] परन्तु व्योम [आकाश] की अनुवृत्ति इस तरह कहीं भी नहीं होती। बस यही बुद्धि का भेद कहा जाता है [जिस का कथन इसी श्लोक के दूसरे चरण में किया गया है]। सद्वस्त्वधिकवृत्तित्वाद् धर्मी, व्योम्नस्तु धर्मता । धिया सतः पृथक्कारे ब्रूहि व्योम किमात्मकम् ॥६८॥ अधिक में वृत्ति वाली होने से सद्वस्तु तो धर्मी है तथा अल्पदेशवृत्ति होने से आकाश उसका धर्म माना जाता है। अब तुम बुद्धि की सहायता से सत् को पृथक् करके बताओ कि आकाश का आत्मा [रूप] क्या है ? देखो रूपरसादि सभी में रहने वाला, द्रव्य कहाने वाला पदार्थ, जैसे धर्मी होता है, इसी प्रकार आकाशादि सभी में अनु- वृत्त हुआ सत् ही धर्मी है, तथा रसादि से व्यावृत्त रहने वाला ‘रूप’ जैसे धर्म है इसी प्रकार वायु आदि से व्यावृत्त होने वाला आकाश भी ‘धर्म’ ही है। अब तुम अपनी बुद्धि से आकाश में से सत्ता को तो पृथक् करलो और फिर बताओ कि वह विचारा आकाश किस स्वरूप का रह गया है ? [सत् को बुद्धि से पृथक् करने की बात इसलिये कही है कि वैसे तो सत् किसी वस्तु से पृथक् हो ही नहीं सकता]। अवकाशात्मकं तच्चेदसत्तदिति चिन्त्यताम् । भिन्नं सतो ऽसच्च नेति वक्षि चेद्व्याहतिस्तव ॥६९॥ यदि तुम उस आकाश को [सत्स्वरूप न बता कर] अवकाश रूप बताओ तो [सत् से विलक्षण होने से] उसे असत् ही तो समझना पड़ेगा [क्योंकि सत् से भिन्न असत् ही होता है।]