पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५९ यदि यह कहो कि वह सत् से विलक्षण भी है और असत् भी नहीं है तो यह तो तुम्हारी उल्टी बात है [भला इसे कौन मान सकता है ? ] भातीति चेद् भातु नाम भूषणं मायिकस्य तत् । यदसद् भासमानं तन्मिथ्या स्वप्नगजादिवत् ॥७०॥ यदि यह आकाश असत् होता तो प्रतीत भी न होता ! परन्तु यह तो प्रतीत हो रहा है । इसका उत्तर यह है कि यह प्रतीत होता है तो हुआ करो । यह [असत् होने पर भी प्रतीत होना] तो मायवादी का भूषण ही है । देखो जो वस्तु असत् हो [स्वरूप से तो न हो] परन्तु प्रतीत होती हो, वह सुपने के हाथी आदि पदार्थों की तरह मिथ्या होती है । जातिव्यक्ती, देहिदेहौ, गुणद्रव्ये यथा पृथक् । वियत्सतो स्तथैवास्तु पार्थक्यं कोऽत्र विस्मयः ॥७१॥ तुम्हारे [नैयायिक वैशेषिक के] मत में [नियम से सदा साथ दीखने वाले भी] जाति और व्यक्ति, देहधारी और देह तथा गुण और द्रव्य, जैसे पृथक् पृथक् हैं [जैसे ये भिन्न भिन्न हैं] इसी प्रकार [नियम से सदा साथ ही दीखने वाले भी] आकाश और सत् पृथक् पृथक् हैं। इस में विस्मय की कौन सी बात है । बुद्धोपि भेदो नो चित्ते निरूढिं याति चेत्तदा । अनैकाग्रचात् संशयाद्वा रूढ्यभावोऽस्य ते वद ॥७२॥ यदि समझा हुआ भी यह भेद [किसी दुर्बलता के कारण] चित्त में जमता नहीं है, तो बताओ कि उस बात के जी में न बैठने का कारण तुम्हारी अनेकाग्रता है अथवा कोई संशय है।