पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७६ पंचदशी कादाचित्कत्वतो नात्मा स्यादानान्दमयोऽप्ययम् । विम्बभूतो य आनन्द आत्मासौ सर्वदा स्थितेः॥१०॥ यह 'आनन्द' भी कादाचित्क[कभी कभी होने वाला=सदा न रहने वाला] होने से [मेघ आदि कादाचित्क पदार्थों के समान] आत्मा नहीं है। किन्तु बुद्धि आदि में प्रतिबिम्बित होकर बैठे हुए आनन्दमय का बिम्बभूत अर्थात् कारणभूत जो आनन्द है, वही तो सच्चा आत्मा है। क्योंकि वह सदा ही बना रहता है [नित्य है] ननु देहमुपक्रम्य निद्रानन्दान्तवस्तुषु । मा भूदात्मत्वमन्यस्तु न कश्चिदनुभूयते ॥११॥ अन्नमय देह से लेकर निद्रा तथा आनन्द पर्यन्त पदार्थों में आत्मभाव नहीं है तो न सही, परन्तु इन के अतिरिक्त और भी तो कोई वस्तु अनुभव में नहीं आती है [जिसे आत्मा कहा जा सकता हो]। बाढं, निद्रादयः सर्वेऽनुभूयन्ते न चेतरः । तथाप्येतेऽनुभूयन्ते येन तं को निवारयेत् ॥१२॥ इस प्रश्न का उत्तर यह है कि—"निद्रानन्द से लेकर देह पर्यन्त पदार्थ उपलब्ध होते हैं और कुछ भी पदार्थ उपलब्ध नहीं होता" तुम्हारा यह कहना तो बिलकुल ठीक है। परन्तु इन सब पदार्थों का अनुभव जो करता है उस को कौन हटा सकता है। [तात्पर्य यह है कि यह तो ठीक है कि इन के अतिरिक्त और कोई उपलब्ध नहीं होता है परन्तु जिस अनुभव के बल से इन सब आनन्दमयादि में उपलभ्यमानता आ गयी है उस अनुभव की सत्ता का निषेध तुम कैसे कर सकते हो]