भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 726 में से

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[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७

स्वयमेवानुभूतित्वाद् विद्यते नानुभाव्यता । ज्ञातृज्ञानान्तराभावादज्ञेयो न त्वसत्तया ॥१३॥ स्वयं अनुभूतिरूप होने से वह तत्त्व किसी का अनुभाव्य नहीं होता है । उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान दूसरा न होने से वह अज्ञेय रहता है। उस के अज्ञेय होने का कारण असत्ता नहीं होती । इन आनन्दमयादियों का जो साक्षी है वह क्योंकि अनु- भव रूप है इसी से वह अनुभाव्य कभी नहीं होता है । उस के 'अज्ञेय' होने का कारण उसकी असत्ता नहीं है । किन्तु उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान कोई होता ही नहीं है इस कारण से वह अज्ञेय बना हुआ है। ऐसी अवस्था में केवल अनुपलब्ध होने से ही उसे असत् नहीं मान बैठना चाहिये । उपलब्ध तो विषय हुआ करते हैं । वह किसी का विषय नहीं है । इसी से वह किसी को उपलब्ध नहीं होता है । वह तो उपलब्ध करने वालों का स्वयं आत्मा [आपा] ही होता है । माधुर्यादिखभावानामन्यत्र स्वगुणार्पिणाम् । स्वस्मिंस्तदर्पणापेक्षा नो, न चास्त्यन्यदर्पकम् ॥१४॥ माधुर्य आदि स्वभाव वाले [गुडादि पदार्थ] जौ चने आदि में, अपने माधुर्य आदि गुणों को डाल देते हैं, वे अपने आप में तो उन मधुरता आदि की ज़रूरत ही नहीं रखते [वे गुडादि यह कभी नहीं चाहते कि कोई हमको आकर मीठा कर दे ] इसके अतिरिक्त गुडादि में मधुरता को उत्पन्न करने वाली कोई वस्तु भी तो नहीं है ।

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