भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (१०१) करटक आह-“कथमेतत् ?” स आह- करटक बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला- कथा ८. कस्मिंश्चिद्वने भासुरको नाम सिंहः प्रतिवसति स्म । अथासौ वीर्य्यातिरेकान्नित्यमेवानेकान् मृगशशकादीन् व्यापादयन्न उपरराम । अथान्येद्युस्तद्वनजाः सर्वे सारङ्ग- वराहमहिषशशकादयो मिलित्वा तमभ्युपेत्य प्रोचुः-“स्वा- मिन् ! किमनेन सकलमृगवधेन नित्यमेव ? यतस्तव एकेनापि मृगेण तृप्तिर्भवति । तत् क्रियतामस्माभिः सह समयधर्मः । अद्य प्रभृति तव अत्रोपविष्टस्य जातिक्रमेण प्रतिदिनमेको मृगो भक्षणार्थं समेष्यति । एवं कृते तव तावत्प्राणयात्रा क्लेशं विना अपि भविष्यति, अस्माकञ्च पुनः सर्वोच्छेदं न स्यात् । तदेष राजधर्मोऽनुष्ठीयताम् । उक्तञ्च- किसीएक वनमें भासुरकनाम सिंह रहताथा वह पराक्रमकी अधिकतासे अनेक मृग शशक आदिको मारताहुआ उपरामको प्राप्त न होता । तब दूसरे किसी दिन उस वनके सब जिव मृग शूकर भैंसे शशकादि मिलकर उसके निकट जाकर बोले,-“स्वामिन् ! इन सब मृगोंके मारनेसे क्या लाभ है, नित्यही तुम्हारी तो एकही मृगसे तृप्ति होजाती है सो हमारे सग प्रतिज्ञा करलो । आजसे लेकर तुम्हारे यहा बैठेहुएके पास जातिक्रमसे भक्षणके निमित्त एक मृग आवेगा ऐसा करनेसे तुम्हारी प्राणयात्रा क्लेशके बिना होगी और हम सबकाभी नाश न होगा सो यह राजधर्मका अनुष्ठानकरो । कहाहै- शनैः शनैश्च यो राज्यमुपभुङ्क्ते यथाबलम् । रसायनमिव प्राज्ञः स पुष्टिं परमां व्रजेत् ॥ २३८ ॥ हे राजन् ! जो शनैः २ बलके अनुसार खाताहै वह प्राज्ञ रसायनकी समान पुष्टिको प्राप्त होताहै ॥ २३८ ॥ विधिना मन्त्रयुक्तेन रूक्षापि मथितापि च । प्रयच्छति फलं भूमिररणीव हुताशनम् ॥ २३९ ॥