पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(१०२) पञ्चतन्त्रम् । विधि और मन्त्रसे युक्त (अर्थात् सुयुक्ति विधिसे) जोतीहुई कठिन भूमि भी बहुत फलको देतीहै, जैसे अरणी अग्निको मथनेसे देतीहै ॥ २३९ ॥ प्रजानां पालनं शस्यं स्वर्गकोशस्य वर्द्धनम् । पीडनं धर्मनाशाय पापायायशसे स्थितम् ॥ २४० ॥ प्रजापालन राजाओंको प्रशंसनीय है। यही स्वर्गके कोषका बढानाहै। प्रजाको पीडा देना धर्मके नाश, पाप और अकीर्तिके लिये होताहै ॥ २४० ॥ गोपालेन प्रजाधेनोर्वित्तदुग्धं शनैः शनैः । पालनात्पोषणाद्ग्राह्यं न्याय्यां वृत्तिं समाचरेत् ॥ २४१ ॥ गोपालको प्रजारूपी गौका दूध शनैः २ ग्रहण करना चाहिये, पालन पोषण और न्यायकी वृत्तिसे ग्रहणकरै ॥ २४१ ॥ अजामिव प्रजां मोहाद्यो हन्यात्पृथिवीपतिः । तस्यैका जायते तृप्तिर्न द्वितीया कथञ्चन ॥ २४२ ॥ और जो राजा मोहसे बकरी समान प्रजाको नष्टकरताहै, उस एककीही तृप्ति होती है, दूसरेकी कदाचित् नहीं ॥ २४२ ॥ फलार्थी नृपतिर्लोकान्पालयेद्यतमास्थितः । दानमानादितोयेन मालाकारोऽङ्कुरानिव ॥ २४३ ॥ फलकी इच्छावाला राजा यत्नसे लोकोको पालनकरै जिसप्रकार दान मानके जलसे माली अंकुरोंको बढाताहै ॥ २४३ ॥ नृपदीपो धनस्नेहं प्रजाभ्यः संहरन्नपि । आन्तरस्थैर्गुणैः शुभ्रैर्लक्ष्यते नैव केनचित् ॥ २४४ ॥ दीपककी समान राजा प्रजासे धनरूपी स्नेहको ग्रहण करता हुआ अपने अन्तरमे स्थित श्रेष्ठ गुणोके कारण किसीको लक्षित नहीं होताहै ॥ २४४ ॥ यथा गौर्दुह्यते काले पाल्यते च तथा प्रजाः । सिच्यते चीयते चैव लता पुष्पफलप्रदा ॥ २४५ ॥ जैसे समयपर गौ दुही जातीहै ऐसेही पालीहुई प्रजा समयपर दुही जातीहै सींचीहुई लताही समयपर पुष्प फलादि प्रदान करतीहै ॥ २४५ ॥ यथा बीजङ्कुरः सूक्ष्मः प्रयत्नेनाभिरक्षितः । फलप्रदो भवेत्काले तद्वल्लोकः सुरक्षितः ॥ २४६ ॥