भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( १०५ )

निमित्त मध्यान्ह समय प्राप्त होता था । तब कभी जातिके क्रमसे खरगोशकी वारी आई वह सब मृगोंसे प्रेरित हुआ इच्छा न करनेपरभी शनै २ जाता उसके मारनेके उपायको चिन्ता करता हुआ समयको बिताकर व्याकुल हृदयसे जबतक जाताहै, तबतक मार्गमें जाते हुए उसने कूपदेखा । जब कूपपर गया तब उसमे अपनी परछाही देखकर उसने मनमे विचार किया कि, “यह एक उत्तम उपाय है मैं भासुरकको क्रोधित कराकर इस कूपमें गिराऊंगा” तब यह कुछ दिनशेषरहे भासुरकके समीप प्राप्तहुआ। सिहभी समयके बीतनेसे भूखसे शुष्ककंठ क्रोधमें भरा जीभको चाटता हुआ विचारता था, “अहो प्रभात ही भोजनके निमित्त यह वन निर्जीव कर दूंगा” इसप्रकार उसके विचारते वह खरगोश शनै २ जाय प्रणा- मकर उसके आगे स्थित भया । तब प्रज्वलित आत्मा भासुरक उसे घुड़कता- हुआ बोला-“रे नीच खरगोश ! एक तो तू लघु दूसरे समयको बिताकर आया हे इस अपराधसे तुझको मारकर सबेरे सभी मृगोका नाश करूंगा” । तब खरगोश विनयपूर्वक बोला-“स्वामिन् ! इसमें न मेरा अपराध न अन्यजीवोंका है सो कारण सुनिये । सिह बोला,-“शीघ्र निवेदन कर जबतक तू मेरी डाढोंके अन्तर्गत न होता है”। खरगोश बोला,-“स्वामिन् ! संपूर्ण मृगोंने आज जाति- क्रमसे मेरा अति लघु कलेवर जानकर पाच खरगोशोंसहित मुझे आपके पास भेजा । सो मैं आता हुआ मार्गमें एक अन्य सिंहने विवरसे निकल कर कहा,- “रे तुम कहा जातेहो ? अपने इष्टदेवताका स्मरण करो” । तब मैने कहा-“हम स्वामी भासुरकके पास उसके भोजनको प्रतिज्ञार्थमैसे जाते हैं” उसने कहा-“जो ऐसा है तो यह वन मेरा है, मेरे साथ प्रतिज्ञासे सब जीवोको वर्तना चाहिये, चोर है वह भासुरक । और जो वह यहाका राजा है तो विश्वासके निमित्त चार खरगोशोंको यहा रखकर उसे बुलाकर बहुतशीघ्र आधा इससे हम दोनोंके बीचमें जो कोई पराक्रमसे राजा होगा वही इन सबको खायगा” सो मैं उसकी आज्ञासे स्वामीके पास आया हू यह समयके उल्लंघनका कारण है सो इसमे स्वामीही प्रमाण हैं”। यह सुनकर भासुरक बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो शीघ्र मुझे उस चोर सिंहको दिखाओ जिससे मैं इन मृगोके कोपको उसके ऊपर छोडकर स्वस्थ होऊ । कहा है-

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