भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( १२६ ) पञ्चतन्त्रम् । जो शत्रुको अन्य उपायोंसे नहीं मारसके तो अपनी कन्या देकर भी मारे क्योकि, उसके मारनेमें दोष नहीं अर्थात् किसी प्रकारसेभी शत्रु का मारनां दोषकारक नहीं है ॥ २९९ ॥ कृत्याकृत्यं न मन्येत क्षत्रियो युधि सङ्गतः । प्रसुप्तो द्रोणपुत्रेण धृष्टद्युम्नः पुरा हतः ॥ ३०० ॥” युद्ध करनेको तैयार हुवा शूरवीर युद्धमें कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार न करे सोही कहते हैं कि, देखो पूर्वकालमें द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामाने सोता- हुआ भी धृष्टद्युम्न मारडाला ॥ ३०० ॥” तदहं तस्य निश्चयं ज्ञात्वा त्वत्सकाशमिहागतः । साम्प्रतं मे नास्ति विश्वासघातकदोषः । मया सुगुप्तमन्त्रस्तव निवे- दितः । अथ यत् ते प्रतिभाति तत्कुरुष्व” इति । अथ सञ्जी- वकस्तस्य तद्वज्रपातदारुणं वचनं श्रुत्वा मोहमुपागतः । अथ चेतनां लब्धा सवैराग्यमिदमाह-“भो ! साधु चेद- मुच्यते- इसलिये मैं उसका निश्चय करके तुम्हारे समीप आया हूं। अब मेरेको विश्वास घातका कोई दोष नहीं। यह गुप्त सलाह मैंने तुम्हारे अगाडी निवेदन करदीहै। इसके अनन्तर तुमको जो श्रेष्ठ प्रतीत होवै सो करो”। पश्चात् संजीवक वज्र पातसरीखा तिसका वह वचन सुनकर मोहको प्राप्त होगया । इसके अनन्त संजीवक बुद्धिको प्राप्त होकर वैराग्यसे यह वचन कहने लगा कि,-“भो ! यह यथार्थ कहाहै- दुर्जनगम्या नार्यः प्रायेणास्नेहवान्भवति राजा । कृपणानुसारि च धनं मेघो गिरिदुर्गवर्षी च ॥ ३०१ ॥ नारी प्रायःकरके दुर्जनगम्यहैं अर्थात् अपने दुर्जनोंसे भी मिलसकतीहैं और राजा स्नेह रहित होताहै, धन कृपणके पासही रहता है और मेघ प्रायः करके पर्वत और दुर्गपर बरसते हैं ॥ ३०१ ॥ अहं हि सम्मतो राज्ञो य एवं मन्यते कुधीः । बलीवर्दः स विज्ञेयो विषाणपरिवर्जितः ॥ ३०२ ॥