पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १२७ ) मैं राजाका मानाहुआहू जो मूर्ख ऐसे मानताहै वह शृङ्गरहित बैल अर्थात् पशुतुल्य है ॥ ३०२ ॥ वरं वनं वरं भैक्ष्यं वरं भारोपजीवनम् । वरं व्याधिर्मनुष्याणां नाधिकारेण सम्पदः ॥ ३०३ ॥ मनुष्योंको वनका निवास श्रेष्ठहै और भिक्षासे भोजन श्रेष्ठहै और भार उठा- कर जीना श्रेष्ठहै और व्याधिभी श्रेष्ठहै परंतु सेवाकरके सम्पत् प्राप्तहोना श्रेष्ठ नहीं ॥ ३०३ ॥ तदयुक्तं मया कृतं यदनेन सह मैत्री विहिता । उक्तञ्च- सो मैंने बडा अनुचित किया कि, जो इसके साथ मैत्री करी । कहाहै- ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् । तयोर्मैत्री विवाहश्च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ ३०४ ॥ जिनका समान धनहै और समान कुलहै उनकेही मैत्री और विवाह होने योग्य हैं और सबलनिर्बलोंके मैत्री विवाह होने योग्य नहीं ॥ ३०४ ॥ तथाच- ओरभी कहाहै- मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरङ्गैः । मूर्खाश्च मूर्खैः सुधियः सुधीभिः समानशीलव्यसनेन सख्यम् ॥ ३०५ ॥ मृग मृगोंके साथ सग करते हैं, गो गोवोंके साथ, अश्व अश्वोंके साथ, मूर्ख मूर्खोंके साथ, बुद्धिमान् बुद्धिमानोंके साथ, क्योकि मैत्री अपने तुल्य स्वभाव व व्यसनवालोंकीही होतीहै ॥ ३०५ ॥ तद्यदि गत्वा तं प्रसाद्यामि तथापि न प्रसादं यास्यति । उक्तञ्च- इसकारण जो मैं जाकर तिसको प्रसन्न भी करूंगा तो भी वह प्रसन्न नहीं होवेगा । कहाहै- निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति ध्रुवं स तस्यापगमे प्रशाम्यति ।