पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १२९ ) तत्परिज्ञातं मया यत् प्रसादमसहमानैः समीपवर्त्तिभिः एष पिङ्गलकः प्रकोपितः । तेनायं मम अदोषस्यापि एवं वदति । उक्तञ्च- सो यह मैने जान लिया कि, प्रसादको न सहनेवाले समीपवर्त्तियोने इस पिंगलकको मेरे ऊपर क्रुद्ध कर दिया इस कारण यह मुझ अदोषीको भी ऐसा कहताहै। कहाहै- प्रभोः प्रसादमन्यस्य न सहन्तीह सेवकाः । सपत्न्य इव संक्रुद्धाः स्वपत्नयाः सुकृतैरपि ॥ ३०९ ॥ सेवक प्रभुकी प्रसन्नता होनेसे उसको ( मनुष्य ) नही सहसकते हैं अपने आचरण किये भावसे सौत स्त्रिये जैसे किसी एकपर किये स्वामीके प्रसादको नहीं सह सक्तीहैं ॥ ३०९ ॥ भवति चैवं यद्गुणवत्सु समीपवर्त्तिषु गुणहीनानां न प्रसा- दो भवति । उक्तञ्च- यह होताहीहै गुणवाले समीपवर्त्तियोमें गुणहीनॉपर प्रसाद नहीं होताहै। कहाहै- गुणवत्तरपात्रेण छाद्यन्ते गुणिनां गुणाः । रात्रौ दीपशिखाकान्तिर्न भानावुदिते सति ॥ ३१० ॥” अति गुणशालि जनोंसे गुणियोके गुण तिरस्कृत किये जाते हैं जैसा रात्रिमें दीपकी शिखा मनोहर लगतीहै सूर्य उदयमे नहीं ॥ ३१० ॥” दमनक आह-“भो मित्र ! यद्येवं तन्नास्ति ते भयं प्र- कोपितोऽपि स दुर्जनैः तव वचनरचनया प्रसादं यास्यति” । स आह-“भो ! न युक्तमुक्तं भवता लघूनामपि दुर्जनानां मध्ये वस्तुं न शक्यते उपायान्तरं विधाय ते नूनं घ्नन्ति । उक्तञ्च- दमनक बोला-“भो मित्र ! जो ऐसाहै तो तुमको भय नहीं क्रोधित कराया हुआ भी वह दुर्जनोंसे तुम्हारी बचनरचनासे प्रसन्न होजायगा” । वह बोला- “यह तुमने युक्त न कहा लघुभी दुर्जनोंके मध्यमें नहीं रहाजाता उपायान्तर विधानकर वे अवश्य मारतेहैं । कहाहै- ९