भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( १५६ ) पञ्चतन्त्रम् । तब वे तीनों जाकर मेघनादके आगे समस्त वृत्तान्तको निवेदन कर स्थित हुए । तब कहने लगा कि-“क्या वस्तु है यह क्षुद्र हाथी क्रोध किये हुए महाजनोंके आगे ! सो मेरी सम्मति करो। मक्षिके! तू जाकर दोपहरके समय उस मदोद्धतहाथीके कानमें वीणाशब्दकी समान शब्दकर जिससे श्रवणसुखकी लाल- सासे वह नेत्र मींचलेगा, उसी समय यह खुटबढईकी चोंचसे आंख फोडा हुआ आन्धा हो प्याससे व्याकुल हुआ खाईके निकट मेरा परिवार सहित शब्द श्रवण कर जलाशय मानकर प्राप्त होगा । तब गर्तको प्राप्तहो गिरेगा और फिर मरजायगा । इसप्रकार कौशल करो तो वैरसाधन होजायगा" तब यही करनेपर मक्खीके गानसुखसे नेत्र मींचतेही खुटबढईसे आंखें फोडाहूआ मध्यान्ह समय घूमता मडकके शब्दका अनुसरण करता बडे गर्तको प्राप्तहो गिरकर मरगया । इससे मैं कहताहूं “चटका खुटबढईसे इत्यादि” टिट्टिभ आह-“भद्रे ! एवंभवतु, सुहृद्वर्गसमुदायेन समुद्रं शोषयिष्यामि” इति निश्चित्य बकसारसमयूरादीन् समाहूय प्रोवाच-“भोः ! पराभूतोऽहं समुद्रेणाण्डकापहारेण तच्चि- न्त्यतामस्य शोषणोपायः” । ते सम्मन्त्र्य प्रोचुः “अशक्ता वय समुद्रशोषणे, तत् किं वृथाप्रयासेन । उक्तञ्च- टिट्टिभ बोला,-"भद्रे ! यही होगा सुहृद्वर्गोंके सहित सागर शोषलूंगा" ऐसा निश्चय कर बक सारस मृगादिको बुलाकर बोला-“भो ! मुझे अण्डे हरण कर इस सागरने पराभूत कियाहै सो इसके सुखानेका कोई उपाय करो” । वे सम्मति कर बोले,-“सागर शोषनेमे हम असमर्थ हैं क्यों वृथा प्रयास करतेहो । अबलः प्रोन्नतं शत्रुं यो याति मदमोहितः । युद्धार्थं स निवर्तेत शीर्णदन्तो गजो यथा ॥ ३७१ ॥ निर्बल और उन्नत शत्रुके पास जो मदमोहित होकर युद्धार्थ जाताहै वह शीर्णदन्त हाथीकी समान युद्धके लिये निवृत्त होता है ॥ ३७१ ॥ तदस्माकं स्वामी वैनतेयः अस्ति, तत्तस्मै सर्वमेतत् परि- भवस्थानं निवेद्यतां येन स्वजातिपरिभवकुपितो वैरानृण्यं ग- च्छति । अथवा अत्रावलेपं करिष्यति तथापि नास्ति वो दुःखम् । उक्तञ्च-