पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १५८ ) पञ्चतन्त्रम् । , चाटुकार दुर्वृत्त साहसिंयोसे ( दुर्जन ) तथा कपट छलवालोंसे पीड़ित हुई प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ३७४ ॥ प्रजानां धर्मषड्भागो राज्ञो भवति रक्षितुः । अधर्मादपि षड्भागो जायते यो न रक्षति ॥ ३७५ ॥ ! रक्षा करनेसे राजाको प्रजाके धर्मका छठाभाग मिलताहै और जो रक्षा नहीं करता उसको अधर्मका छठा भाग प्राप्त होता है ॥ ३७५ ॥ प्रजापीड़नसन्तापात्समुद्भूतो हुताशनः । राज्ञः श्रियं कुलं प्राणानादग्ध्वा विनिवर्त्तते ॥ ३७६ ॥ प्रजापीड़नके सन्तापसे उठीहुई अग्नि राजाकी लक्ष्मी कुल और प्राणोंको दग्ध करकेही निवृत्त होती है ॥ ३७६ ॥ राजा बन्धुरबन्धूनां राजा चक्षुरचक्षुषाम् । राजा पिता च माता च सर्वेषां न्यायवर्तिनाम् ॥ ३७७ ॥ अबन्धुओंका राजाही बन्धुहै, अनेत्रोंका राजाही नेत्रहै सब न्यायमें बर्तने- वालोंका पिता माता राजाही है ॥ ३७७ ॥ फलार्थी पार्थिवो लोकान्पालयेद्यत्नमास्थितः । दानमानादितोयेन मालाकारोऽङ्कुरानिव ॥ ३७८ ॥ फलकी इच्छावाला यत्नसे लोकोंकी पालना करे और उनका दान मानकरे जैसे माली जलसे अंकुरोंको पालता है ॥ ३७८ ॥ यथा बीजाङ्कुरः सूक्ष्मः प्रयत्नेनाभिरक्षितः । फलप्रदो भवेत्काले तद्वल्लोकः सुरक्षितः ॥ ३७९ ॥ जिसप्रकार सूक्ष्म बीजांकुर यत्नसे रक्षा किया हुआ कालमें फल देनेवाला होताहै इसी प्रकार सुरक्षित लोक भी है ॥ ३७९ ॥ हिरण्यधान्यरत्नानि यानानि विविधानि च । तथान्यदपि यत्किञ्चित्प्रजाभ्यः स्यान्नृपस्य तत् ॥ ३८० ॥ सुवर्ण, धन, रत्न अनेक विमान और जो कुछभी है राजाको सब प्रजासे प्राप्त होताहै ॥ ३८० ॥" अथ एवं गरुडः समाकर्ण्य तद्दुःखदुःखितः कोपाविष्टश्च व्यचिन्तयत् । "अहो ! सत्यमुक्तमेतैः पक्षिभिः तदहं गत्वा