भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (१७५)

युद्धके उद्योगसे अल्प फलकी वाञ्छा करते हैं उन दुर्नीति चेष्टावाले राजोंकी लक्ष्मी सन्देहमें आरोपण की जाती है ॥ ४०७ ॥ तद्यदि स्वाम्यभिघातो भविष्यति तत् किं त्वदीयमन्त्रबु- द्वया क्रियते । अथ सञ्जीवको न बध्यते तथापि अभव्यं यतः प्राणसन्देहात् तस्य च वधः, तन्मूढ ! कथं त्वं मन्त्रिप्दम- भिलषसि सामसिद्धिं न वेत्सि, तद्वृथा मनोरथोऽयं ते दण्डरुचेः । उक्तञ्च- सो यदि स्वामीका नाश होगा तो क्या तेरी मंत्रबुद्धिसे किया जाय । और सञ्जीवक न मरे तो भी अशुभ होगा, जो कि, प्राणसन्देहसे उसका वध है सो मूर्ख ! किसप्रकार तू मन्त्रीपदकी अभिलाषा करता है साम सिद्धिको नहीं जानता सो दण्डरुचि करनेवाले तेरा यह मनोरथ वृथा है । कहा है- सामादिदण्डपर्यन्तो नयः प्रोक्तः स्वयम्भुवा । तेषां दण्डस्तु पापीयांस्तं पश्चाद्विनियोजयेत् ॥ ४०८ ॥ सामसे लेकर दण्ड पर्य्यन्त ब्रह्माने नीति कही है उसमें दंड पापी है उसको पीछे नियुक्त करना चाहिये ॥ ४०८ ॥ तथाच- और देखो- साम्नैव यत्र सिद्धिर्न तत्र दण्डो बुधेन विनियोज्यः । पित्तं यदि शर्करया शाम्यति कोऽर्थः पटोलेन ॥ ४०९ ॥ जहां साम उपायसेही सिद्धि होती है पंडितको वहां दंड प्रयुक्त नहीं करना चाहिये, यदि मिश्री शर्करासेही पित्त शान्त होजाय तो पटोल देनेसे क्या फायदा ॥ ४०९ ॥ तथाच- और भी- आदौ साम प्रयोक्तव्यं पुरुषेण विजानता । सामसाध्यानि कार्य्याणि विक्रियां यान्ति न काचित्४१० ज्ञानी पुरुषोंको प्रथम साम उपाय प्रयोग करना चाहिये सामसे सिद्ध हुए कार्य्य विकारको प्राप्त नहीं होते हैं ॥ ४१० ॥