पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
न चन्द्रेण न चौषध्या न सूर्येण न वह्निना । साम्नैव विलयं याति विद्वेषिप्रभवं तमः ॥ ४११ ॥ चन्द्रमा, औषधी, सूर्य, अग्निसे विद्वेषतासे उत्पन्न हुआ अंधकार दूर नहीं होता किन्तु साम उपायसेही दूर होता है ॥ ४११ ॥
तथा यत् त्वं मन्त्रित्वमभिलषसि तदपि अयुक्तं यतस्त्वं मन्त्रगतिं न वेत्सि । यतः पञ्चविधो मन्त्रः स च कर्म्मणामा- रम्भोपायः, पुरुषद्रव्यसम्पत्, देशकालविभागो, विनिपात- प्रतीकारः । कार्य्यसिद्धिश्चेति । सोऽयं स्वाम्यमात्ययोरेकतम- स्य किंवा द्वयोरपि विनिपातः समुत्पद्यते लग्नः। तद्यदि का- चिच्छक्तिरस्ति तद्विचिन्त्यतां विनिपातप्रतीकारः, भिन्नस- न्धाने हि मन्त्रिणां बुद्धिपरीक्षा, तन्मूर्ख ! तत् कर्तुमसमर्थ- स्त्वं यतो विपरीतबुद्धिरसि । उक्तञ्च-
और जो तू मन्त्रीपदकी अभिलाषा करता है सोभी अयुक्त है जो कि, तू मंत्रकी गतिको नहीं जानता है जो कि, पांचप्रकारका मंत्र होताहै-कर्मके आर- भका उपाय करना, उपयुक्त कर्मचारियोंकी द्रव्य सम्पत्ति, देश कालका विभाग ( इस समयदान इस समय दंडका प्रयोग इत्यादि ) अपायका प्रतीकार करना और कार्यसिद्धि । सो यह पिंगलक और संजीवक दोनों स्वामी भृत्यमेंसे एकका वा दोनोंका मरण होना उपस्थितहै । सो यदि कोई शक्ति हो तो इस अनिष्ट अपायका प्रतीकार करो भिन्न ( १ ) सन्निधानमेही मन्त्रियोंकी बुद्धिकी परीक्षा कीजातीहै सो हे मूर्ख ! यह करनेमें तू असमर्थ है कारण कि, विपरीतबुद्धिहै । कहाहै-
मन्त्रिणां भिन्नसन्धाने भिषजां सान्निपातिके । कर्म्मणि व्यज्यते प्रज्ञा स्वस्थे को वा न पण्डितः ॥४१२॥ पृथक् हुओंको मिलानेमें मन्त्रियोंकी, सन्निपात रोगके कर्ममें वैद्योंकी बुद्धि देखी जाती है स्वस्थतामें कौन पंडित नहीं है ॥ ४१२ ॥
( १ ) द्वेषियोंकामिलाप कराना ।