भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( १७७ ) अन्यच्च- औरभी- घातयितुमेव नीचः परकार्य्यं वेत्ति न प्रसाधयितुम् । पातयितुमेव शक्तिर्नाखोरुद्धर्त्तुमन्नपिटम् ॥ ४१३ ॥ नीच पराया कार्य नष्ट करना ही जानता है सिद्ध करना नहीं । चूहेकी अन्न पिटारीके गिरा देनेकीही शक्ति है उठारखनेकी नहीं ॥ ४१३ ॥ अथवा न ते दोषोऽयं स्वामिनो दोषो यस्ते वाक्यं श्रद्द- धाति । उक्तञ्च- अथवा यह तेरा दोष नहीं स्वामीका दोष है जो तेरे वचनमें श्रद्धा की, कहाहै- नराधिपा नीचजनानुवर्त्तिनो बुधोपदिष्टेन पथा न यान्ति ये। विशन्त्यतो दुर्गममार्गिनिर्गमं समस्तसम्बाधमनर्थपञ्जरम् ४१४ जो राजा नीच जनोंसे सेवित होते हैं वे पंडितोंके उपदेश किये मार्गसे नहीं चलते हैं, इस कारण वे निकलनेके मार्गसे रहित समस्त बाधाओंसे युक्त अन- र्थके समूह दुर्गम मार्गमें प्रवेश करते हैं ॥ ४१४ ॥ तद्यदि त्वमस्य मन्त्री भविष्यसि तदा अन्योऽपि कश्चिन्न अस्य समीपे साधुजनः समेष्यति । उक्तञ्च- सो यदि तू इसका मन्त्री होगा तो दूसरा कोई साधु पुरुष इसके समीप न आवेगा । कहाहै- गुणालयोऽप्यसन्मन्त्री नृपतिर्नाधिगम्यते । प्रसन्नस्वादुसलिलो दुष्टग्राहो यथा ह्रदः ॥ ४१५ ॥ गुणोंका स्थान राजा असन्मन्त्रीजनोंसे घिराहो तो उसके निकट कोई नहीं जाता है प्रसन्न ( निर्मल ) स्वादिष्ट जलवाला सरोवर जैसे नाकेसे युक्त होनेसे अगम्य होताहै ॥ ४१५ ॥ तथाच-शिष्टजनरहितस्य स्वामिनोऽपि नाशो भविष्यति उक्तञ्च- तथाच-शिष्टजनरहित स्वामीकाभी नाश होगा । कहाहै- चित्रास्वादकथैर्भृत्यैरनायासितकार्मुकैः । ये रमन्ते नृपास्तेषां रमन्ते रिपवः श्रिया ॥ ४१६ ॥ १२