पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८० ) पञ्चतन्त्रम् । तथाच- तैसेही- उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये । पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्द्धनम् ॥ ४२० ॥ मूर्खोंको उपदेश करना कोपके वास्ते है शान्तिको नहीं सर्पोंको दूध पिलाना केवल विष बढानेके निमित्त है ॥ ४२० ॥ अन्यच्च- औरभी- उपदेशो न दातव्यो यादृशे तादृशे जने । पश्य वानरमूर्खेण सुगृही निर्गृहीकृतः ॥ ४२१ ॥" जैसे तैसे मनुष्यको उपदेश देना न चाहिये देखो एक मूर्ख वानरने उत्तम गृहस्थ घरसे शून्य कर दिया ॥ ४२१ ॥” दमनक आह-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत् । दमनक बोला-"यह कैसे ?" वह बोला- कथा १८. अस्ति कस्मिंश्चित् वनोद्देशे शमीवृक्षः । तस्य लम्ब- मानशिखायां कृतावासौ अरण्यचटकदम्पती वसतः स्म । अथ कदाचित् तयोः सुखसंस्थयोर्हेमन्तमेघो मन्दं मन्दं वर्षितुमारब्धः । अत्रान्तरे कश्चित् शाखा- मृगो वातासारसमाहतः प्रोद्धलितशरीरो दण्डवीणां वादयन् वेपमानः तत शमीमूलमासाद्य उपविष्टः । अथ तं तादृशमवलोक्य चटका प्राह-"भो भद्र ! किसी एक वनके स्थानमें शमीका पेड था । उसकी लम्बमान शिखामें निवास करनेवाले बनेले चटक चटका रहतेथे । एक समय सुखसे बैठे हुए उन दोनोंके हेमन्त कालका मेघ मन्द २ वर्षने लगा । इसी समय कोई शाखामृग ( वानर ) पवन वर्षासे हत हुआ वर्षाके जलसे भीजा शरीरवाला दंड- वीणाको बजाता हुआ कंपित हुआ, उस शेमलके नीचे आकर बैठा उसकी यह दशा देख चटका बोली,-"भो भद्र !